यहां की गणगौर की सादगी सवा तीन सौ साल से जस की तस है। न कोई बनावटीपन न कोई रंग-रोगन। बिल्कुल उसी रूप में जिस रूप में इन्हें मेवाड़ से लाया गया था।
हम बात कर रहे हैं सीकर की गणगौर की। जयपुर की तरह ही सीकर की गणगौर भी काफी प्रसिद्ध है। यहां ईसर गणगौर का जोड़ा अपने आप में बेहद अनोखा है। जब से इन्हें तैयार किया गया है तब से अब तक किसी तरह का रंग रोगन नहीं किया गया। इनकी पुरानी रंगत बनी रहे इसके लिए इन्हें एक खास तरह के कपड़े में लपेट कर रखा जाता है।
जब भी इन प्रतिमाओं को निकाला जाता है तो उससे पहले इन प्रतिमाओं को खास स्नान करवाया जाता है। प्रतिमाओं की चमक बनी रहे इसके लिए एक खास तरह के इत्र से इन्हें स्नान करवाकर सफाई की जाती है। इससे चेहरे के रंग रूप को नुकसान नहीं होता और चमक भी बरकरार रहती है।
गणगौर की सवारी निकाले जाने वाली सांस्कृतिक मंडल से जुड़े लोगों की मानें तो यह सब एक मान्यता के तहत किया जाता है। माना जाता है कि हरे रंग के कपड़े में लपेटे जाने से ईसर गणगौर का रंग रूप नहीं बिगड़ता। हां यह जरूर है कि करीब बीस साल बाद उनकी पोशाक बदली गई है।