राजस्थान में विधानसभा सत्र बुलाने में राजभवन की भूमिका खत्म होती जा रही है। यह आरोप लगाते हुए भाजपा विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस पर हमलावर हो गई है। यह मुद्दा इन दिनों सत्ता पक्ष कांग्रेस और भाजपा में बड़ी सियासी लड़ाई का कारण बनता जा रहा है ।
पिछले दो साल से सत्रावसान दरकिनार करने का मामला अब तूल पकड़ने लगा है। सत्रावसान नहीं करके सीधे ही सत्र बुलाने पर भाजपा ने आपत्ति जताते हुए सोमवार को सदन के बाहर और अंदर हंगामा किया। भाजपा विधायकों ने इस मामले को लेकर विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के चैंबर में भी धरना दिया और कार्यवाही के दौरान वैल में आकर नारेबाजी की।
सीएम ने राज्यपाल पर भी साधा निशाना
गहलोत इस मामले में राजभवन पर भी आरोप लगाते हैं। उन्होंने कहा कि जुलाई 2020 में विधानसभा सत्र बुलाने के सरकार के प्रस्ताव को राज्यपाल कलराज मिश्र ने तीन बार लौटा दिया था। मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछली बार राज्यपाल को भाजपा ने मजबूर कर दिया। कैबिनेट विधानसभा बुलाने के लिए आग्रह करती है तो राज्यपाल को विधानसभा बुलानी पड़ती है। तब राज्यपाल के खिलाफ इतने आलेख लिखे गए कि इतना इतिहास में कभी नहीं हुआ।
दरअसल, पायलट गुट के साथ चली अदावत के दौरान गहलोत ने विधानसभा सत्र बुलाने की राज्यपाल से मांग की थीं। लेकिन, राजभवन से चार बार आपत्ति लगा कर फाइल लौटा दी थी। बाद में गहलोत ने अपने सभी विधायकों के साथ 24 जुलाई 2020 को राजभवन में धरना दिया, राज्यपाल के खिलाफ नारेबाजी की। बाद में राज्यपाल ने विधानसभा सत्र बुलाने की मंजूरी दी थी। गहलोत और पायलट के बीच चली सियासत का पटाक्षेप भी विधानसभा में बहुमत साबित करने के साथ ही हो गया था।
कटारिया ने बोला-विधायकों के हक का हो रहा हनन
गहलोत भले ही सत्रावसान नहीं करने को अपनी रणनीति मानते हुए, लेकिन नेता प्रतिपक्ष नेता गुलाबचंद कटारिया, सरकार की इस तरीके को लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए गलत मानते हैं। कटारिया कहते हैं कि नए तरीके सत्र बुलाकर विधायकों के प्रश्न पूछने के अधिकारों का हनन है। राजभवन को भी किनारे किया जा रहा है। यह परंपरा बना ली है। यदि विधायक सवाल नहीं पूछेंगें तो विधानसभा में क्या करेंगे। विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने सदन में इस मामले पर कहा कि सत्र बुलाना या सत्रावसान करने का मामला राजभवन और सरकार के बीच है। इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है।