राजस्थान में चुनाव में 13 महीने बाकी है लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों के दिग्गज अपने-अपने प्रभुत्व और वर्चस्व की स्थापना में जुट चुके हैं। प्रदेश में जहां एक तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की रार किसी से छुपी नहीं है, उसी तरह भाजपा में भी पिछले चार साल से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को किनारे लगाने के भरसक प्रयास में भाजपा के ही नेता जुटे हुए हैं लेकिन निरंतर चली आ रही अनकही लड़ाई अब किसी विराम की ओर बढ़ती नजर आ रही है।
गौरतलब है कि जनता और कार्यकर्ता भी राजे की एक झलक के लिए लालायित नजर आ रहे हैं और राजे से मिलने के लिए आतुर भी हैं। भाजपा प्रदेश इकाई के निरंतर प्रयासों के बाद भी राजे की लोकप्रियता को कम नहीं किया जा सका है। भाजपा प्रदेश इकाई कहीं ना कहीं अब वसुंधरा राजे के सामने सरेंडर होती नजर आ रही है।
राजस्थान विधानसभा के चुनाव 13 महीने में होना है। भाजपा को विधानसभा में जीत चाहिए क्योंकि लोकसभा की 25 सीटों का भी रास्ता विधानसभा चुनाव से ही होकर निकलेगा। ऐसे में राजे और संगठन के बीच की दूरी कम करने के लिए भाजपा क्या रणनीति बना रही है, इसी पर चर्चा है। क्या राजस्थान भाजपा की अंतर्कलह खत्म होने जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने अपने बड़े दिल से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे की धार्मिक यात्रा को अनौपचारिक समर्थन दिया है, जिसका प्रमाण आमेर यात्रा के दौरान मैडम के स्वागत में आमेर मंडल के पदाधिकारियों की मौजूदगी इसका संकेत है।
बहरहाल, प्रदेश इकाई में जो भी घट रहा हो लेकिन प्रदेश के कई बड़े नेता प्रदेश संगठन मंत्री के इस कदम से संतुष्ट और खुश नहीं है। संगठन मंत्री का राजे के बंगले पर जाना कई लोगों को नागवार गुजरा है पर अभी प्रदेश भाजपा में चुप्पी है। जिसके चलते कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। प्रदेश संगठन मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों का ही झुकाव मैडम के तरफ है तो जल्द ही भाजपा राजस्थान में बहुत कुछ बदलने और घटने की संभावना बनी हुई है।