राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव और प्रमुख शिक्षा सचिव सहित सीबीएसई को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों न स्कूल फीस नियंत्रण कानून, 2016 और इसके नियमों के प्रावधानों को रद्द कर दिया जाए। मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नान्द्रजोग और न्यायाधीश एसपी शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश सुशील शर्मा की ओर से दायर जनहित याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिए।
याचिका में अधिवक्ता राजेन्द्र सोनी और अधिवक्ता मोहित सोनी ने अदालत को बताया कि निजी स्कूलों की फीस निर्धारण के लिए नवंबर 2005 में जस्टिस पीके तिवाडी ने अपनी रिपोर्ट दी थी। राज्य सरकार ने इस संबंध में कानून बनाने की सिफारिश को मानने के अलावा दूसरी कोई सिफारिश नहीं मानी।
राज्य सरकार की ओर से 2013 में बने फीस नियंत्रण कानून को भी स्कूल संचालकों के दबाव में नए कानून से रिपील कर दिया। इसके अलावा 2013 के कानून से बनी शिवकुमार शर्मा की कमेटी की ओर से तय फीस को भी लागू नहीं किया जा रहा है।
याचिका में कहा गया कि नए नियमों के तहत निजी स्कूल विद्यार्थियों को मनमर्जी से स्टेशनरी सहित अन्य सामग्री बेच सकते हैं। फीस तय करने का अधिकार अभिभावक-अध्यापक की समिति को दिया गया है, लेकिन इसकी बैठक बुलाने का अधिकारी सिर्फ स्कूल प्रबंधन को ही है। इसके अलावा यदि समिति फीस बढ़ाती है तो स्कूल प्रबंधन को ही उसकी अपील करने का अधिकार है।
याचिका में गुहार की गई है कि निजी स्कूलों की फीस तय कर 2014 से 2017 तक वसूली अधिक फीस वापस दिलाई जाए। इसके अलावा एक बार फीस तय होने के बाद तीन साल तक वही फीस वसूली जाए।
याचिका में यह भी गुहार की गई है कि तिवाडी कमेटी की सभी सिफारिशों को लागू किया जाए। जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में जवाब पेश करने के आदेश दिए हैं।प्रोफेसर भर्ती पर लगी रोक हटी, याचिकाएं खारिज