कुख्यात गैंगस्टर एनकाउंटर की जांच को लेकर राजपूत समाज की मांग पर राज्य सरकार बैकफुट पर आ गई है। जानिए, सरकार पर संगठन किस तरह भारी पड़ा और किस कद्दावर नेता ने दिया दखल...
कुख्यात गैंगस्टर के एनकाउंटर के बाद सरकार राजपूत समाज के आंदोलनकारियों की जिन मांगों को जायज नहीं मान रही थी, अब उन पर आज अपनी सहमति जता दी है।
एनकाउंटर की सीबीआई जांच कराने के लिए केंद्र सरकार को सिफारिश भेजने समेत राजपूत समाज की सभी सात मांगों पर सरकार ने अपनी सहमति जता दी है। इसके बाद राजपूतों ने भी आंदोलन वापस ले लिया। आनंदपाल एनकाउंटर मामले में राज्य सरकार ने आज अचानक जो यू टर्न लिया, उसके पीछे वजह इस मामले को लेकर पॉलिटिकल प्रेशर बताया जा रहा है।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी राजस्थान की यात्रा पर आ रहे हैं। इस दौरान संगठन और सत्ता के बीच विवाद का मैसेज उन तक नहीं जाए, इसलिए भी सरकार ने अपना कदम पीछे हटाया है। राजपूत समाज ने शाह के सामने प्रदर्शन की चेतावनी भी दी थी।
इस कद्दावर नेता के दखल के बाद सरकार पर आया दबाव
राजनाथ सिंह
- फोटो : फाइल फोटो
बताया जा रहा है कि इस मामले में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की दखल के बाद वसुंधरा सरकार बैकफुट पर आई। आनंदपाल के परिजनों और राजपूत समाज ने एनकाउंटर को हत्या बताते हुए सवाल उठाए है और इस मामले को लेकर राजपूत नेताओं ने राजनाथ सिंह से भी मुलाकात की थी।
राजपूत समाज के कई नेताओं ने आंदोलन के दौरान भाजपा की खिलाफत की खुली घोषणा की। उन्होंने अगले साल होने वाले विधानसभा और फिर उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में देख लेने की खुली चेतावनी दी थी।
यहां तक कि भाजपा में राजपूत विधायक और वरिष्ठ नेता भी गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया के रवैये पर अपना कड़ा रूख जता चुके हैं। उन्होंने ने भी समाज के दवाब में खुलकर सामने आने की बात पार्टी हाईकमान को कही।
गृहमंत्री इसलिए नहीं चाहते सीबीआई जांच
राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया
- फोटो : amar ujala
राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया आनंदपाल एनकाउंटर की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे। राजपूत समाज की इस मांग को लेकर कटारिया कई बार कह चुके थे कि वे अपनी पुलिस के खिलाफ जांच का आदेश नहीं सकते हैं।
उन्होंने कहा था कि वे पुलिस की कार्रवाई को एकदम सही मानते हैं। उनका कहना है कि पुलिस गोली नहीं चलाती तो, आनंदपाल की गोली से कई पुलिसकर्मी मारे जाते। उनका कहना था कि इससे पुलिस का मनोबल गिरेगा।
संगठन के दवाब में उन्हें अब अपना फैसला बदलना पड़ा। दूसरी तरफ राजपूत समाज की मानें तो समझौता सांवराद में श्रद्धांजलि सभा के दौरान हुई बातचीत के दौरान हो गया था, लेकिन उस दौरान हिंसा भड़कने से यह मामला अटक गया।