लोकसेवकों को बचाने और मीडिया पर पाबंदी लगाने वाले विवादित बिल को लेकर राजनीति पहले से ही गर्माई हुई है। सदन से सड़क तक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं और बिल का विरोध किया जा रहा है। राजस्थान हाईकोर्ट में भी बिल के खिलाफ तीन याचिकाएं दायर हो चुकी हैं। वहीं, अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने भी इस बिल को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी हैं।
पीसीसी चीफ सचिन पायलेट ने हाईकोर्ट से गुहार की है कि इस विवादित 'दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश, 2017' को रद्द कर दिया जाए। उन्होंने बताया है कि लोकसेवकों को प्रोटेक्ट करने के लिए सरकार अध्यादेश लाई है।
दरअसल पहले ही देशभर में कड़ी आलोचना झेल चुकी राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने इस बिल को सदन की मंजूरी के बाद पुनर्विचार के लिए प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) में भेज दिया है। इसे सरकार का बैक फुट पर आना कहा जा रहा है।
सरकार से लेनी होगी इजाजत
वसुंधरा राजे
दरअसल सरकार के नए बिल के अनुसार अब राजस्थान में सांसद-विधायक, जज और अफसर के खिलाफ मामला दर्ज करवाना अब आसान नहीं होगा। इनके खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाने से पहले सरकार से इजाजत लेनी होगी।
अगर यह बिल पारित हो जाता है, तो सीआरपीसी और आईपीसी में संशोधन करना होगा। संशोधन के तहत धारा 228 बी जोड़ी जाएगी। जबकि कानूनविदों के अनुसार सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए कोर्ट का सहारा लिया जाता है। इस धारा पर भी संकट खड़ा हो जाएगा।
वहीं बिल के मसौदे के अनुसार राजस्थान में सांसद-विधायक, जज और अफसर के खिलाफ मामला दर्ज करवाने से पहले सरकार से इजाजत लेनी होगी। ड्यूटी के दौरान यदि नौकरशाहों के खिलाफ कोई शिकायत है, तो भी एफआईआर से पहले राज्य सरकार से मंजूरी लेनी होगी।
सोशल मीडिया भी आएगा दायरे में
राजस्थान विधानसभा
दूसरी तरफ सोशल मीडिया भी इसके दायरे में आएगा। यदि मामला दर्ज होने से पहले मीडिया या सोशल मीडिया पर संबंधित लोक सेवक का नाम उजागर हो जाता है, तो नाम उजागर करने वाले के खिलाफ मामला दर्ज हो सकेगा।
सांसद-विधायक, जज और अफसर के खिलाफ यदि पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती थी, तो अदालत में इस्तगासा दायर किया जा सकता था, लेकिन इस बिल के बाद कोर्ट भी इस्तगासे या प्रसंज्ञान से अनुसंधान के आदेश नहीं दे सकेगी।
इस बिल में 180 दिन की समयावधि भी रखी गई है। इसके अनुसार शिकायत होने के बाद सरकारी कर्मचारी या अन्य लोगों के खिलाफ सरकार 180 दिन में निर्णय लेगी। तय समयावधि के बाद अगर कोई निर्णय नहीं आता है, तो सबंधित अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कोर्ट के जरिए ही रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है।