राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि निचली अदालत की ओर से मिली जमानत को रद्द करने का डीजे कोर्ट का आदेश अंतवर्ती आदेश की श्रेणी में आता है। ऐसे में उस आदेश के खिलाफ रिवीजन याचिका दायर नहीं की जा सकती। इसके साथ ही अदालत ने इस संबंध में दायर आपराधिक रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया।
न्यायाधीश पंकज भंडारी की एकलपीठ ने यह आदेश मोहनलाल व दो अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। याचिका में अधिवक्ता प्रवीण बलवदा और अधिवक्ता मोहित बलवदा ने अदालत को बताया कि फर्जी दस्तावेज के मामले में झुंझुनुं की निचली अदालत ने याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा किया था। जमानत रद्द कराने के लिए परिवादी गोपीराम ने डीजे कोर्ट में प्रार्थना पत्र पेश किया। जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए गत 24 अप्रेल को याचिकाकर्ता को मिली जमानत रद्द कर दी।
इस आदेश को याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर कर चुनौती दी गई। वहीं परिवादी पक्ष की ओर से कहा गया कि डीजे कोर्ट का आदेश अंतवर्ती आदेश की श्रेणी में आता है। ऐसे में इस आदेश के खिलाफ रिवीजन याचिका दायर नहीं की जा सकती। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि जमानत रद्द करने का आदेश अंतिम आदेश है। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने डीजे कोर्ट के आदेश को अंतवर्ती आदेश की श्रेणी में मानते हुए रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया है।