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बूढ़े पिता का सवाल...तो क्या सरकार खोल पाएगी मेरे बेटे की 'बेड़ियां'

Mon, 18 Sep 2017 03:22 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
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बेड़ियों में जकड़ा हुआ स्वरूपाराम - फोटो : अमर उजाला
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जैसे-जैसे वो बड़ा होता गया, परिवार की खुशी काफूर होती गई। घर में बेटे होने के बाद जो खुशियां आई थी, वो इस बात के सामने आने के बाद गायब हो गई कि बेटा मानसिक विक्षिप्त है।
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जैसलमेर के रहने वाले उगाराम के घर 18 वर्ष पहले स्वरूपाराम ने जन्म लिया। उगाराम का बेटा स्वरूपाराम बचपन से ही मानसिक विमंदित है। बेटा शरीर से तो बड़ा होता गया, लेकिन सोच समझ व दिमाग से बच्चा ही बना रहा। जिस पर परिवार को उसकी चिंता दिन रात खाने लग गई।  उसकी अजीबोगरीब हरकत से, खुद को नुकसान पहुंचाने पर उसके बेडि़यों में जकड़कर रखा जाने लगा। स्वरूपाराम के पिता की आंखों में चमक की जगह आंसूओं ने ली। उगाराम अपने बेटे के ईलाज के लिए भी कई जगह घूमा, लेकिन आखिर थक हार कर उसे घर में एक कमरे में बंद ही करना पड़ा।


 
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इसलिए रखते हैं बेड़ियों में

बेड़ियों में जकड़ा हुआ स्वरूपाराम - फोटो : अमर उजाला
जानकारी के अनुसार जैसलमेर के डेढ़ा गांव में उगाराम अपने बेटे स्वरूपाराम को न चाहते हुए भी जंजीरों में जकड़कर रखते हैं। आस-पड़ोसियों व बेटे को नुकसान नहीं पहुंचे, इसलिए उन्हें मजबूरी में ऐसा करना पड़ रहा है। पिछले 15 साल से स्वरूपाराम के मानसिक विमंदित होने के कारण उसका कई जगह ईलाज भी करवाया । जिससे पिता ने अब बेटे के ठीक होने की उम्मीद भी छोड़ दी है।

स्वरूपाराम के मानसिक विमंदित होने के बाद पिता ने कई दरवाजे खटखटाए, लेकिन कहीं से भी कोई मदद के हाथ नहीं उठे। उगाराम ने अपने बेटे के लिए सरकारी नुमाइंदों से भी मदद की आस लगाई। सरकार द्वारा विकलांगों के लिए भी विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही है, लेकिन धरातल पर जरूरतमंद बच्चों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। स्वरूपाराम खुला होने की स्थिति में कई किलोमीटर तक पैदल भाग जाता है। कहीं कोई दुर्घटना व अनहोनी नहीं हो इसके चलते परिवार के सदस्यों ने उसे घर के बाहर बने कमरे में रखकर बेडियों में बंद कर दिया है।
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