राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस की ओर से माल और मुल्जिम के पता नहीं चलने के आधार पर पेश एफआर को स्वीकार करने के बजाय न्यायिक अधिकारियों को मामले की प्रगति रिपोर्ट मांगनी चाहिए। बिना प्रगति रिपोर्ट यदि मामले को बंद कर दिया जाता है तो जांच अधिकारी का दायित्व भी खत्म हो जाता है। अदालत ने आदेश की पालना के लिए सभी अधीनस्थ अदालतों को आदेश की प्रति भेजने के आदेश दिए हैं।
न्यायाधीश महेन्द्र माहेश्वरी की एकलपीठ ने यह आदेश देवप्रकाश शर्मा की ओर से दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने साइबर ठगी के इस प्रकरण में निचली अदालत के एफआर स्वीकार करने के आदेश को रद्द करते हुए आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने तक अदालत को केस बंद नहीं करने को कहा है। याचिका में अधिवक्ता श्यामलाल शर्मा ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता से साइबर ठगी कर एक लाख दस हजार रुपए बैंक खाते से निकाले गए। याचिकाकर्ता ने इस संबंध में गत वर्ष भट्टा बस्ती थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई।
याचिकाकर्ता ने अपने स्तर पर आरबीआई से जानकारी लेकर पुलिस को बताया कि आरोपी केरल में मैट्रोकर्मी हैं। इसके बावजूद भी पुलिस ने माल-मुल्जिम का पता नहीं चलने के आधार पर एफआर पेश कर दी। जिसे निचली अदालत ने स्वीकार कर लिया। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से पेश रिवीजन अर्जी को भी अदालत ने खारिज कर दिया।