राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से खेलों की उपेक्षा करने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पिछले तीन साल में एक भी राष्ट्रीय प्रतियोगिता नहीं हुई है। इससे पता चलता है कि राज्य सरकार खेलों के विकास के लिए कितनी गंभीर है। इसके साथ ही अदालत ने इंडियन ओलम्पिक संघ को नोटिस जारी कर खेलों के विकास के संबंध में पक्ष रखने को कहा है। वहीं अदालत ने जेडीए को नोटिस जारी कर पूछा है कि खेल मैदानों को अन्य कार्यों के लिए क्यों मुहैया कराया जा रहा है।
न्यायाधीश जेके रांका की एकलपीठ ने यह आदेश रामपाल शर्मा की ओर से दायर याचिका पर लिए गए स्वप्रेरित प्रसंज्ञान पर सुनवाई करते हुए दिए। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त मुख्य सचिव जेसी मोहंति और ओलम्पियन गौपाल सैनी अदालत में पेश हुए। अदालत ने कहा कि जब क्रिकेट के लिए लोढ़ा कमेटी की सिफारिशें लागू हो सकती हैं तो अन्य खेलों के लिए एनके जैन कमेटी की सिफारिशों को लागू क्यों नहीं किया जा सकता। इस पर एसीएस मोहंति ने कहा कि इस संबंध में संबंधित अधिकारियों की दो बार बैठक हो चुकी है। प्रकरण को विधि विभाग को भेजा गया है।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने आया कि चित्रकूट स्टेडियम को खेलों के अलावा अन्य गतिविधियों के लिए दिया जा रहा है। इस पर अदालत ने कहा कि स्टेडियम में केवल खेल ही होने चाहिए। जेडीए जवाब पेश कर बताए कि ऐसा क्यों किया जा रहा है। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि खेलों के संसाधनों पर वर्ष 2016-17 में प्रदेश में 26 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए हैं। इसके अलावा वर्तमान में 70 स्थाई कोच नियुक्त है। इसकी संख्या बढ़ाकर जल्दी ही 120 की जाएगी। इस पर अदालत ने कहा कि राजस्थान से काफी छोटा हरियाणा है, लेकिन वहां सात सौ से अधिक कोच प्रशिक्षण दे रहे हैं। अदालत के पूछने पर एसीएस ने कहा कि वे तीन साल से खेल विभाग का काम देख रहे हैं, लेकिन एक भी राष्ट्रीय प्रतियोगिता नहीं हुई है।
इस पर अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह सरकार की गंभीरता को दिखाता है। अदालत ने कहा कि खेल संघों में एक ही परिवार के लोग बारी-बारी से पदाधिकारी बन जाते हैं। जिन्हें खेलों की समझ नहीं है, वे भी अध्यक्ष बने बैठे हैं।