राजस्थान हाईकोर्ट ने अलवर जिले के भूमि अवाप्ति से जुडे मामले में स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लिया है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि 17 जून 1999 से पहले की कितनी कॉलोनियों के नियमन के मामले लंबित चल रहे हैं। इसके अलावा कितने प्रकरणों को रद्द किया गया है? और यदि कोई प्रकरण रद्द किया गया तो भूमि पर सरकार ने कब्जा लिया या नहीं?
न्यायाधीश मनीष भंडारी की एकलपीठ ने यह आदेश मालीराम जाट व अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के स्वप्रेरित प्रसंज्ञान लेते हुए दिए। अदालत ने राज्य सरकार को कहा कि जब कृषि भूमि का गैर कृषि कार्यो के लिए आवंटन नियम, 2012 बन चुके हैं तो परिपत्र के आधार पर नियमन की कार्रवाई क्यों की जा रही है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने आया कि राज्य सरकार ने नियमन के संबंध में 6 जनवरी 2016 को एक परिपत्र जारी किया है। इस पर राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि परिपत्र समय-समय पर जारी होने वाले परिपत्रों का ही वृहद रूप है। यह खासकर उन मामलों के लिए है, जहां कॉलोनी 17 जून 1999 से पहले बस चुकी है।
राज्य सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि अब राजस्थान शहरी क्षेत्र (कृषि भूमि का गैर कृषि कार्यो के लिए) आवंटन नियम, 2012 के तहत नियमन व आवंटन किया जा रहा है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि जब नियम बन गया तो परिपत्र क्यों जारी किए गए हैं। इसके साथ ही अदालत ने प्रकरण में स्वप्रेरित प्रसंज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से संबंधित जानकारी पेश करने को कहा है। अदालत ने कहा कि प्रकरणों में भेदभाव के कारण मुकदमों की संख्या बढ़ रही है। सरकार बताए कि नियम होने के बावजूद परिपत्रों के आधार पर कार्रवाई क्यों हो रही है।