विश्व में चांदी से बने ये सबसे बड़े कलश है
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जयपुर रियासत के पूर्व महाराजा माधोसिंह गंगा भक्त थे। उनकी इस भक्ति को देख कर अंग्रेज भी दंग रह गए।
सवाई माधोसिंह के संबंध में कहा जाता है कि वे प्रात: उठते ही सबसे पहले गंगाजल ग्रहण करते थे। एक बार उन्हें इंग्लैंड जाना पड़ गया। दरअसल इंग्लैंड के एडवर्ड सप्तम की ताजपोशी थी। इसके लिए सवाई माधोसिंह को भी इंग्लैंड आने का निमंत्रण दिया। माधोसिंह ने इसे स्वीकार किया।
इंग्लैंड तक पहुंचने के लिए उन्होंने नवनिर्मित ओलम्पिया जहाज किराये पर लिया और यात्रा से पूर्व जहाज को उन्होंने गंगाजल से धोकर पवित्र किया। वे अपने साथ चांदी के दो विशाल कलश लेकर गए। इनमें गंगाजल भरा था। गंगाजल से स्नान करते थे और भोजन से पहले गंगाजल ग्रहण करते थे। वे 25 दिन की समुद्री यात्रा के बाद इंग्लैंड पहुंचे। वहां उनकी इस भक्ति को देखकर इंग्लैंड वासी भी दंग रह गए।
वे जब यात्रा पूरी करके लौटे तो उन्होंने जयनिवास गार्डन में गोविन्द देवजी के पीछे गंगा माता का मंदिर बनवाया। यहां लगे एक शिलालेख के अनुसार ये मंदिर 1914 में उन्होंने अपनी निजी आय से बनवाया था। इस मंदिर के निर्माण पर उस वक्त 35 हजार 444 रुपए खर्च हुए थे। इसके चार साल बाद एक अन्य मंदिर इसके ठीक सामने बनवाया। यहां पर उन्होंने राधा गोपालजी की मूर्ति स्थापित करवाई। ये वहीं मूर्तियां है जिन्हें लेकर वे इंग्लैंड गए थे। वे राधा गोपालजी के भी भक्त है।
वे जिन चांदी के कलशों में गंगाजल लेकर गए थे, वे कलश आज जयपुर के सिटी पैलेसे के सर्वतोभद्र में रखे हुए है। हजारों सैलानी इन कलशों को देखते है और माधोसिंह की भक्ति के बारे मे जानकर आश्चर्य चकित हो जाते है। कहा जाता है कि विश्व में चांदी से बने ये सबसे बड़े कलश है। इन्हें गंगाजली भी कहा जाता है।