प्रदेश के उपभोक्ता मान्यता प्राप्त उपभोक्ता संगठनों के माध्यम से न्यायालय में परिवाद दर्ज कराकर राहत पा सकते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 में उपभोक्ताओं के लिए सरल और सस्ती न्याय प्रणाली उपलब्ध कराई गई है।
उपनिदेशक संजय झाला ने बताया कि उपभोक्ता न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किए जाने की सुविधा इस अधिनियम में उपलब्ध है, किन्तु उपभोक्ता संगठन की मान्यता और इससे संबंधित प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई है। इसलिये सक्रिय स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठनों को चिन्हित कर उन्हें मान्यता प्रदान करने के लिए पूर्व में प्रचलित दिशा-निर्देशों में संशोधन के बाद नए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। झाला ने स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठनों की मान्यता की शर्तों के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि उसी संगठन को मान्यता प्रदान की जाएगी. जो राजस्थान सोसायटीज पंजीकरण अधिनियम-1958 के अंतर्गत अथवा अन्य सक्षम कानून के तहत पंजीकृत संस्था/संगठन हो और संगठन कम से कम 3 वर्ष से पंजीकृत हो, संगठन के उद्देश्यों में राज्य अथवा राज्य के किसी जिले में उपभोक्ता संरक्षण संबंधी गतिविधि से संबंधित प्रावधान कम से कम विगत 3 वर्ष से हो।
उन्होनें बताया कि संगठन द्वारा पंजीयन के पश्चात् प्रतिवर्ष उपभोक्ता संरक्षण से संबंधित कम से कम 4 सार्वजनिक आयोजन किए जा रहे हों, जिनमें प्रत्येक में कम से कम 100 लोगों की भागीदारी हो। साथ ही संगठन की जनसाधारण, सार्वजनिक संगठनों और प्रशासन में अच्छी साख हो। संगठन में महिलाओं की समुचित भागीदारी हो साथ ही संगठन की आय के स्रोत पारदर्शी हो।
उपनिदेशक ने बताया कि संगठन की कार्यकारिणी में दो से ज्यादा सदस्य एक ही परिवार के न हो और संगठन का वित्तीय प्रबंध भलीभांति व्यवस्थित, पारदर्शी और नियमित ऑडिट हो। संगठन की मान्यता अवधि एक बारीय होगी किन्तु राज्य सरकार/जिला कलक्टर द्वारा समय-समय पर मान्यता की समीक्षा की जा सकेगी। पुराने एवं सभी वर्तमान स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठनों को मान्यता लेना आवश्यक है।
झाला ने बताया इन संगठनों को मान्यता संबंधित जिले के जिला कलक्टर की अभिशंसा पर उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा दी जाएगी। जिसके क्षेत्राधिकार में संगठन का प्रधान कार्यालय होगा। उपभोक्ता संगठन के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए प्रार्थना-पत्र जिला रसद अधिकारी/संभागीय जिला मुख्यालय पर संभागीय उपभोक्ता संरक्षण अधिकारी को प्रस्तुत किया जाएगा।