ग्रामीण परिवेश से आये व्यक्तियों को अक्सर अकुशल मजदूरी वाले कार्य, जो प्रायः असंगठित क्षेत्र में उपलब्ध है, ही करने को मिलते है। इन कार्याे का स्वभाव अक्सर नियमित नहीं होता और इनकी मजदूरी भी कम होती है। इन परिस्थतियों में उन्हें अपना जीवन गुणवत्ता के आधार पर सबसे नीचे वाले पायदान से शुरू करना पड़ता है। ये हाशिये पर रहने वाले लोग अक्सर समूह में रहते है। जिसमे प्रायः या तो इनके गांव के लोग या रिश्तेदार होते है। कच्ची बस्तियों के एक-एक कमरे में कई- कई लोग रहते है। जहां पीने के पानी, स्वच्छता, बिजली, सफाई आदि जैसे मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव होता है। हां, यहां अपराध और असुरक्षा का माहौल अवश्य प्रचुर मात्रा में मिलता है। ऐसे माहौल में मजदूर अक्सर अपने परिवार के साथ रहने को मजबूर होते है। जरा परिकल्पना करके सोचिये कि इस गरीब, मजबूर, ग्रामीण को महानगर में आकर किस-किस प्रकार के हादसों का सामान करना पड़ता होगा और इस प्रकार के सांस्कृतिक अंतराल से उन्हें किस प्रकार का सांस्कृतिक धक्का लगता होगा। इन सब विपरीत परिस्थितियों के बावजूद ये लोग शहरों में बसने को मजबूर हो जाते है। जिनका शरीर तो शहर में, परंतु आत्मा उनके गांव मे ही बस्ती है और इस प्रकार ये लोग अपने परिवार व रिश्तेदार जनों को आर्थिक सहयोग देने में कामयाब हो पाते है। इन भारतीय मजदूरों को प्रवासी बताकर इन्हें शहरीें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और वातावरण पर कुप्रभाव के रूप में देखा जाता है। अक्सर इन भारतीय (प्रवासी) मजदूरों को किसी ना किसी रूप में, कभी किसी राज्य से, कभी किसी राजनीतिक दल से, विरोध का सामान करना पड़ता है। इतनी विपरीत परिस्थितियों और विरोध के पश्चात् भी इन्होंने कभी शहरी छोड़कर गांव की और रूख करने के प्रयास नहीं किये, ‘‘जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां ...........’’।
(क) रोजगार की अनिश्चितता :- कोरोना की बीमारी से बचाव के जो भी माध्यम बताये गये, उसके पश्चात् एक अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है। पता नहीं कौन सा रोजगार चलेगाघ्, कौन सा नहीं ?, कैसे चलेगा ?, कब शुरू होगा ?, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा है। अब जिस मूलभूत कारण से भारतीय (प्रवासी) मजदूर यहां रह रहे थे वहीं समाप्त होता नजर आ रहा है तो यहां रहना व्यर्थ हो गया है। शहरों का जीवन, बगैर पैसे या खर्चे के सम्भव नही है। यहां रहने का, खाने का और अब तो छींकने-खांसने का भी खर्च देना है। इन परिस्थितियों में बगैर रोजगार जीवित रहना सम्भव सा नजर नहीं आता। शहरी माहौल तो ‘‘पैसा फेंको, तमाशा देखो............’’ को ही चरितार्थ होता है।
(ख) सुरक्षा:- भारत देश की इतनी बढ़ी जनसंख्या ऐसा असुरक्षित जीवन जी रही है। यह शायद हम सबकी परिकल्पना से भी परे था। भारतीय (प्रवासी) मजदूर जो हमारे सामाजिक और आर्थिक विकास में एक नींव के पत्थर की भांति काम करते है, क्या इतनी असुरक्षा दी है हमने बदले में उन्हें ? यहां सरकार (मेरा अभिप्रायः किसी प्रकार की दलगत राजनीति अथवा पूर्व या वर्तमान राजनीति से नहीं) की अगर दूरदृष्टि होती और जो फर्ज भी था कि इन प्रवासी मजदूरों को किसी प्रकार के बीमा अथवा अन्य आर्थिक आजादी की सुरक्षा मिली होती तो शायद आज परिस्थितियां बेहतर होती। शहरों में रिश्ते सिर्फ काम से होते है। उन रिश्तों मे अपनेपन की गहराई नही होती है। इसलिये ही शायद आज मजदूर वापिस लौट चला है, ‘‘यहां कौन है तेरा, मुसाफिर रूकेगा कहां............’’।
(य) कभी-कभी अफसोस राजनीति को उस वर्ग पर भी होता है, जो सदा अपने मजदूरों का शुभचिंतक दिखाने में कामयाब हुआ था- जो सिर्फ झण्डा लेकर मुद्दों पर खड़ा हुआ, जो सिर्फ घटनाओं पर केन्दित रहा और उनकी गहराई में छुपी एक भी राजनीति पर संघर्ष ना कर सका। काशः कोई ऐसी बीमा व्यवस्था भी बन जाती जो आज की परिस्थितियो में मजदूरों को कोई सुरक्षा दे पाती। यदि उन्होंने आर्थिक आजादी, आर्थिक पारदर्शिता, और आर्थिक अतिव्ययता जैसे मुद्दों पर काम किया होता तो हमारी अर्थव्यवस्था इतनी ना चरमराती और आज मजदूरोें को उसका लाभ मिलता। मध्यम वर्ग भी शायद मदद के हाथ और ज्यादा बढ़ा पाता। जब देश में बड़े-बड़े घोटाले होते रहे, जब बैंकों का अनर्जक ऋण वापस नहीं आये, जब चुपचाप ही उद्योगपतियों के करोड़ों रूपये माफ किये गये, करोडो रूपये प्रोत्साहन के रूप में उद्योगपतियों को बांटे गये, उन्हें तरह-तरह से फायदा पहुंचाया गया और किसानो के तीन- तीन साल तक भुगतान ना कर उन्हें भी मजूदर बनाया गया। उस समय यह अपने को पढ़ा लिखा और प्रगतिशील राजनीति करने वाले लोगों का समूह कहाॅ था ? यह सब भी शायद अपने स्वार्थ ही सिद्ध कर होगेे और गा रहे थे, ‘‘हम मेहनतकशः जब अपना हिस्सा मागेगे, ...........’’।
(र) 1947 में भारत देश विभाजन के बाद, शायद पहली बार इतनी भारी संख्या में भीड़ सड़को पर उतरी और इतने कष्ट उठाकर, कुछ अपने घर पहुंच गये तो कुछ ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। यह इतिहास शायद पहली बार ही रचा गया होगा कि माहमारी आने से इतनी भारी संख्या में ‘‘वापसी पलायन’’ हुआ। इस मौके पर हमारे नेतागण हमें सीख दे रहे है कि हर समस्या को अवसर में बदल दोे, विचार तो बहुत अच्छा है पर क्या आज के परिपेक्ष में उस मजदूर पर सटीक बैठता है जो इस कशमकश में ही पहले जान बचायें या अवसर पर नजर रखें। हा,ॅ बड़े उद्योगपतियों ने इसकी पालना पूर्ण रूपेण की। हमारे नीति निर्धारकों ने भी इस अवसर का लाभ उठाते हुये मजदूरी के घण्टे 8 से बढ़ाकर 12 कर दिये। एक मजदूर, जो सदा आभाव की जिन्दगी जीता है और उसे किसी प्रकार की सुविधायें परोसी नहीें जाती, अगर वह 8 घंटे काम करता है तो उसकी तैयारी और आने-जाने में उसके 12 घंटे ही खत्म होते है। अब अगर 12 घंटे काम करेगा तो उसके 16 घंटे खर्च होंगे। क्या यह मानवीय है या व्यावहारिक है ? किसी भी व्यक्ति से उसके जीवन के हर रोज 16 घण्टे छीन लेना, जिसको देने के लिये आपके पास कुछ भी नहीं, ‘‘या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो, मै गम को खुशी कैसे कह दूॅ जो कहते है उनकोे कहने दो ...........’’।
(ल) अब खबरे आने लगी कि श्रमिकों के ठेकेदार लक्जरी बस लेकर उन्हें वापिस लेने पहुंच गये। क्या कहें इसे? मजदूर की जीत, मालिक की मजबूरी, शोषण तंत्र की सक्रियता और इन सब के बीच गरीबी- बेचार, लाचार और परेशान पर फिर राजनीति प्रारम्भ। इन सब घटनाओं को देखते हुये सभी- सरकार, विद्वान, नीति- निर्धारको सिर्फ और सिर्फ मूक बधिर दृष्टा की तरह देखते रहे, सब समझ के आरपार, और शायद यही थी सबसे मजबूरी, ‘‘जिन्दगी का सफर है ये कैसा सफर कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं,...........’’।