कोरोना मरीजों के इलाज में महत्वपूर्ण मानी जा रही रेमडेसीवीर दवा का परीक्षण चीन में फेल हो गया है। पहले इस एंटीवायरल दवा का प्रयोग इबोला से पीड़ित मरीजों के इलाज में हो चुका था। अमेरिकी
दवा कंपनी गिलीड साइंसेज दवा का निर्माण करती है। डब्ल्यूएचओ ने अपनी वेबसाइट पर बताया है कि इस दवा का 237 मरीजों पर परीक्षण किया गया था।
इनमें से कुछ को दवा दी गई जबकि कुछ को नहीं दी गई लेकिन दोनों में किसी तरह का बदलाव नहीं दिखा। दवा के परीक्षण को साइड इफेक्ट के चलते जल्द ही रोक दिया गया। वहीं, निर्माता कंपनी गीलीड का कहना है कि इतनी जल्दी निष्कर्ष पर पहुंचना ठीक नहीं है। डब्ल्यूएचओ ने जो पोस्ट की वो पूरी नहीं है।
रैपिड जांच-प्लाज्मा तकनीक भी पीछे
डेविड स्टेट्स ने बताया, रैपिड जांच या प्लाज्मा तकनीक दोनों ही एंटीबॉडी पर टिकी हैं। रैपिड जांच रक्त में एंटीबॉडी की पहचान करता है। जबकि प्लाज्मा तकनीक से रक्त में मौजूद एंटीबॉडी को दूसरे संक्रमित मरीज को दिया जाता है, लेकिन अध्ययनों में साबित हुआ है कि ज्यादातर मरीजों में आईजीएम और आईजीजी एंटीबॉडी दो महीने बाद भी विकसित नहीं हो रही है। ब्रिटेन में हुए अध्ययन में साबित हुआ है कि मरीजों में दो महीने बाद भी एंटीबॉडी बहुज ज्यादा दिखाई नहीं दीं।
जब हम इस वायरस को फ्लू या इन्फ्लूएंजा से जोड़कर देखते हैं तो हमें सबसे पहले इनके आरओ के बीच के अंतर को भी समझना चाहिए। फ्लू का आरओ 1.4 से 1.7 के बीच है। वैक्सीन लेने वाले दो में से एक व्यक्ति फ्लू की चपेट में आ जाता है। अब कोरोना का आरओ 3 से 5 यानी फ्लू की तुलना में कई गुना ज्यादा संक्रमण फैलाने वाला है। इस क्षमता के अनुसार वैक्सीन बनाना आसान नहीं है।
रोग की गंभीरता जरूर होगी कम
अमेरिका के चीफ मेडिकल ऑफिसर डेविड स्टेट्स ने अमर उजाला से कहा कि अगर आप उम्मीद लगा रहे हैं कि वैक्सीन बचा लेगा तो शायद अभी यह मुश्किल है। यह सबसे ज्यादा फैलने वाला संक्रमण है। पशु वैक्सीन भी कारगर नहीं है।
अमेरिकी ट्रायल में निष्कर्ष निकला है कि वैक्सीन संक्रमण रोकने में शायद ही कामयाब हो, लेकिन यह रोग की गंभीरता को जरूर कम कर सकती है।