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क्या अरेस्टर बेड्स लगाकर रोकी जा सकती थी कोझिकोड की विमान दुर्घटना

Mon, 10 Aug 2020 11:59 AM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, कोझिकोड
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Kerala plane crash - फोटो : पीटीआई
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कोझिकोड में हुआ एयर इंडिया एक्सप्रेस विमान हादसा, देश की दूसरी ऐसी दुर्घटना थी जब टेबलटॉप हवाई अड्डे पर विमान रनवे को पार कर गया हो। पहली बार साल 2010 में मैंगलोर में इसी प्रकार का हादसा हुआ था। उस समय भी दुर्घटना का शिकार हुआ विमान एयर इंडिया एक्सप्रेस का था और इस हादसे में लगभग 150 लोगों की मौत हुई थी।

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केरल के कोझिकोड में हुए विमान हादसे ने एक बार फिर इस बहस को ताजा कर दिया है कि क्या ऐसे हवाई अड्डों पर सुरक्षा के इंतजाम और पुख्ता करने की जरूरत है। अगर हां, तो सुरक्षा का स्तर कितना और कैसा होना चाहिए। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि हवाई अड्डों पर ऐसे हादसों को कैसे रोका जा सकता है।


रनवे पर विमान के साथ हादसा होना बेहद असामान्य घटना होती है। इससे कई तरह के सुरक्षा इंतजामों के बारे में सीखे जा सकता है। हवाई अड्डों पर होने वाले ऐसे हादसे को रोकने के लिए दुनिया के कुछ चुनिंदा हवाई अड्डे सुरक्षा मानकों के तौर पर अरेस्टर बेड्स का इस्तेमाल करते हैं।
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अरेस्टर बेड का इस्तेमाल विमान की गति को कम करने या फिर रनवे को पार करने से रोकने के लिए किया जाता है। अरेस्टर बेड का इस्तेमाल उन हवाई अड्डों पर किया जाता है जहां जगह की कमी हो या फिर हवाई अड्डा की प्रकृति ऐसी हो कि वहां बड़े-बड़े सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए टेबलटॉप हवाई अड्डा पर इन अरेस्टर बेड्स का इस्तेमाल किया जा सकता है।

क्या होता है अरेस्टर बेड?

अरेस्टर बेड - फोटो : Aviation Safety Network
अरेस्टर को बनाने के पीछे का मकसद साफ है कि अरेस्टर जो सॉफ्ट ग्राउंड बनाते हैं, वो रनवे को पार करने वाले विमान के भार के तहत आसानी से खराब हो जाते हैं। इसके बाद विमान के टायर उस मैटेरियल को क्रश यानि तोड़ देते हैं, जिससे अरेस्टर बना होता है और इससे विमान की गति धीमी हो जाती है।

यानि कि अरेस्टर बेड एक तरह का ऐसा एरिया होता है जो रनवे के अंत में बनाया जाता है, जिससे रनवे की यात्रा के दुष्परिणामों को कम किया जाता है। अरेस्टर बेड इसलिए बनाया जाता है ताकि रनवे पार करने के बाद भी विमान को कम से कम नुकसान हो और किसी यात्री को चोट ना लगे।

जब अरेस्टर बेड पर विमान आता है तो उसकी गति धीमी हो जाती है क्योंकि अरेस्टर बेड में सीेमेंट की ब्लॉक्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे तोड़ने में विमान की सारी ऊर्जा खत्म हो जाती है और उसकी धीमी पड़ जाती है।

अरेस्टर बेड बनाने के पीछे का सिस्टम

इंजीनियर्ड मैटेरियल अरेस्टिंग सिस्टम (ईएमएएस) को अमेरिका के फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन ने मंजूरी दी थी। ये सिस्टम दुनिया में इस्तेमाल किए जाने वाला सबसे सुरक्षित सुरक्षा उपकरण माना जाता है। साल 1989 में फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन ने इस आविष्कार की शुरुआत की थी।

अलग-अलग तरह के सॉफ्ट ग्राउंड पर इसका इस्तेमाल किया गया, ताकि एक सुरक्षिता बेड को विकसित किया जा सके। साल 1994 में प्रोटोटाइप अरेस्टर बेड बनाया गया, जिसमें सेल्युर सीमेंट ब्लॉक्स का इस्तेमाल किया गया था। 1998 में अमेरिका ने ईएमएएस के डिजाइन, इंस्टॉलेशन और रख-रखाव को मंजूरी दी थी।

तब से लेकर अब तक दुनियाभर के 100 एयरपोर्ट्स पर इन अरेस्टर बेड को इंस्टॉल किया जा चुका है, ताकि रनवे को पार करने जैसे हादसे से बचा जा सके। 
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भारत में अरेस्टर बेड की उपलब्धता

मंगलौर में विमान हादसे में 159 यात्रियों की मौत के बाद पूछताछ रिपोर्ट में कहा गया कि टेबलटॉप हवाई अड्डों पर अरेस्टर बेड प्लेटफॉर्म को बनाया जाए। कोर्ट ने कहा कि ऐसे एयरपोर्ट्स पर ईएमएएस जैसी तकनीकी की इस्तेमाल किया जाए और इन्हें रनवे के अंत में लगाया जाए ताकि गिरने से पहले विमान रूक जाए।

हालांकि हवाई अड्डों के अधिकारियों ने लागत और खर्चे का हवाला देते हुए इसे भारत में इंस्टॉल ना करने की बात कही। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कालीकट एयरपोर्ट के महानिदेशक ने कहा कि भारत में विदेश से मंगाकर 100 करोड़ रुपये की लागत वाले ईएमएएस सिस्टम को लगाना मुश्किल है।

निदेशक ने कहा कि इस तकनीकी का खर्चा नहीं उठाया जा सकता और इसके अलावा एक बार अरेस्टर बेड पर विमान क्रेश हो जाए तो उसे दोबारा सही नहीं किया जा सकता है, ऐसे में बार-बार इतनी महंगी लागत का अरेस्टर बेड लगाना मुश्किल काम है। निदेशक ने कहा कि ऐसे में हर बार 100 करोड़ रुपये का खर्चा वहन नहीं किया जा पाएगा।
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