दुनियाभर में आज वर्ल्ड पीस एंड अंडरस्टैंडिंग डे मनाया जा रहा है। जिसे दुनिया में शांति के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी संस्था के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। आंकड़ों के अनुसार 6.85 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो अपने ही देश में बेगाने हैं। यानि इन्हें अपने ही देश में रहने की जगह नहीं मिल पा रही है।
इसी मुद्दे पर अमेरिका में बीते 20 सालों से अभियान चल रहा है। जिसमें उद्योग जगत की 100 से ज्यादा हस्तियों ने अमेरिकी सांसदों से अमेरिका में बच्चों के रूप में लाए गए अवैध प्रवासियों के लिए संरक्षण की मांग की है। अगर इन्हें शरण मिल जाती है तो भारतीय मूल के 7 हजार प्रवासियों को इससे फायदा पहुंचेगा। जो बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे हैं।
अमेरिका में 6.9 लाख अप्रवासी जब बच्चे थे तब अवैध तरीके से अमेरिका पहुंच गए थे। इनके लिए ड्रीमर्स शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हीं लोगों को अमेरिकी नागरिकता देने के लिए साल 2001 में ड्रीम एक्ट के तौर पर एक विधेयक कांग्रेस में लाया गया था। हालांकि ये एक्ट अभी तक पारित नहीं हो पाया है। अगर ये पारित होता है तो वैध दस्तावेजों के बिना रह रहे लोगों को फायदा पहुंचेगा। आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में 6.85 करोड़ लोग ऐसे हैं जो या तो शरणार्थी हैं या फिर शरण मांग रहे हैं या फिर आंतरिक रूप से विस्थापित हैं।
इस संस्था की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2017 के अनुमानित आंकड़े में 2015 के आंकड़े से काफी वृद्धि हुई है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त फिलिपो ग्रांडी का कहना है कि दुनिया विकास के रास्ते पर तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में आसरे के लिए तरस रहे लोगों के ये आंकड़े अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की विफलता को दर्शाते हैं। उनका कहना है कि पुराने संघर्ष लगातार बने हुए हैं और नए संघर्ष खड़े हो रहे हैं, ऐसे में ये दोनों मिलकर लोगों को विस्थापित कर रहे हैं।
नागरिकता लेेने वालो में भारतीयों की बढ़ रही तादात
दुनिया के दूसरे देशों की नागरिकता लेने वालों में भारतीयों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। भारतीय समुदाय न केवल अमेरिका और यूरोप बल्कि न्यूजीलैंड और लातविया जैसे दूर दराज के छोटे देशों में भी अपने घर जमा रहा है। 2012-2016 में न्यूजीलैंड की नागरिकता के लिए आवेदन करने वालों में सबसे अधिक संख्या चीन, भारत, फिजी और इराक के लोगों की थी।
वहीं साल 2016 में ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड, जापान, लातविया, स्लोवाक रिपब्लिक, ब्रिटेन और अमेरिका में शरण मांगने वाले लोगों में सबसे ज्यादा भारतीय हैं। बता दें लातविया यूरोप का एक छोटा सा देश है, जिसकी आबादी महज 20 लाख है। यहां भी 2015-2016 में 6 हजार से अधिक विदेशी छात्रों ने खुद को रजिस्टर कराया है।
इंटरनेशनल माइग्रेंट रिपोर्ट के अनुसार विदेशों में रह रहे भारतीयों में से 40 फीसदी महज तीन देशों में ही रह रहे हैं। जिनमें सबसे ज्यादा संयुक्त अरब अमीरात में बस गए हैं। और इसके बाद अमेरिका का नंबर आता है।
शरण की आस में हुई 46 हजार की मौत
मिसिंग माइग्रेंट्स प्रोजेक्ट एक अंतरराष्ट्रीय परियोजना है। जो पलायन करने वाले लोगों को लेकर शुरू की गई थी। इस संस्था के आंकड़े बताते हैं कि साल 2000 के बाद से अब तक करीब 46 हजार लोग शरण की आस में अपनी जान गंवा चुके हैं। दुनिया के विभिन्न देशों में मारे गए या लापता होने वाले शरणार्थियों की संख्या 2017 में 1,319 थी। इनमें सबसे अधिक मौतें भूमध्य सागर में हुईं हैं। यहां अप्रैल के मध्य तक करीब 798 लोग या तो लापता हुए हैं या मारे गए हैं।