तंबाकू का सेवन इन्सानी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन चुका है, जिससे निपटने के लिए अकसर एक ही समाधान नजर आता है...प्रतिबंध। लेकिन दुनियाभर में तंबाकू पर रोक को लेकर विरोधाभासी पहलू सामने आते रहे हैं, जिसके चलते इस पर बहस छिड़ी हुई है। कुछ जानकार बेहतर नियमन से तंबाकू का सेवन रोकने की पैरवी करते हैं तो कुछ पूर्ण प्रतिबंध को ही रास्ता मानते हैं। इन दो विपरीत तरीकों के दो उदाहरण हैं भूटान और मलयेशिया, जिन्होंने तंबाकू के खिलाफ अपने तरीके से प्रतिबंध लगाने या नियंत्रित करने की कोशिश की...
भूटान : कालाबाजारी बढ़ी तो हटाना पड़ा प्रतिबंध
भूटान ने 2004 में तंबाकू उत्पादों की बिक्री, उत्पादन और वितरण पर रोक लगा दी थी। शाही सरकार को इस कदम से बौद्ध धर्मावलंबियों के देश में तंबाकू सेवन रुकने की उम्मीद थी। सरकार ने रोक के लिए लोगों की सेहत बचाने और यह नशा बौद्ध धर्म के खिलाफ होने की दलील दी। तंबाकू के इस्तेमाल को अपराध बनाते हुए भारी-भरकम जुर्माने का प्रावधान किया गया।
...तेजी से फंसते गए युवा
- 2006 में हुए सर्वे से खुलासा हुआ कि रोक के बावजूद देशभर में तंबाकू का सेवन जारी है और कालाबाजारी भी शुरू हो चुकी है। इतना ही नहीं लोग महंगे, मिलावटी व खराब गुणवत्ता वाले तंबाकू उत्पाद भी इस्तेमाल करने लगे।
- डब्ल्यूएचओ के एक सर्वे से पता चला कि 13 से 15 साल के 23.7 फीसदी भूटानी किशोरों ने बीते 30 दिन में ही इसका सेवन किया था। इस रिपोर्ट के बाद प्रतिबंध और सख्त कर दिए गए।
- 2010 में हुए कानून संशोधन में ज्यादा गंभीर अपराध घोषित किया। यह भी काम नहीं कर सका।
- 2013 में एक रिपोर्ट से पता चला कि भूटानी युवाओं में धुआं रहित तंबाकू का सेवन 9.6 फीसदी से बढ़कर 21.6 फीसदी पहुंच गया।
कोरोना से हालात बदतर
2019 के बाद कोरोना महामारी के चलते सिगरेट समेत अन्य तंबाकू उत्पादों की कालाबाजारी चरम पर पहुंच गई। सीमा से होने वाली तस्करी से कोरोना के मामले भी बढ़ने लगे। तब सरकार को तंबाकू प्रतिबंध का बेकाम होना मानना पड़ा। नतीजे में रोक का कानून खत्म कर दिया गया।
अब जनजागरण पर जोर
प्रतिबंध हटाने के बाद भूटान सरकार ने तंबाकू से होने वाले नुकसानों के बारे में जागरूक करने के लिए जन शिक्षा अभियान शुरू किया। भूटान के उदाहरण से समझा जा सकता है कि पूर्ण रोक लगाकर तंबाकू का सेवन रोकना बहुत पेचीदा काम है।
मलयेशिया : धीरे-धीरे उपयोग रोकने पर भरोसा
मलयेशिया ने भूटान के उलट तंबाकू से मुक्ति के लिए पूर्ण सख्ती के बजाय लोगों को समझाने और नियमन की राह पकड़ी है। तंबाकू के खिलाफ जनजागरण अभियान तो चलाया जा रहा है। इसके साथ ही 2005 के बाद जन्मे बच्चों को सिगरेट और ई-सिगरेट की बिक्री पर रोक लगाई जा रही है। न्यूजीलैंड ने भी इसी तरह का कदम उठाया है। यानी हर साल सिगरेट बेचने के प्रतिबंध का साल एक-एक करके बढ़ाया जाएगा। इसके लिए मलयेशियाई संसद में जुलाई 2022 को विधेयक लाया जाएगा।
सरकारी पहल को जनसमर्थन
जनजागरण अभियान के साथ नियमन की सरकारी पहल को लोगों का भी समर्थन मिला है। मलयेशियाई ग्रीन लंग एसोसिएशन के सर्वे के मुताबिक, 97 फीसदी लोग चरणबद्ध तरीके से तंबाकू मुक्त देश चाहते हैं। अभी मौजूदा खामियों के चलते मलयेशिया तंबाकू कालाबाजारी में दुनिया में पहले पायदान पर है।
कैंसर : 22 फीसदी मौतें इसके सेवन से
स्वास्थ्य मंत्री खैरी जमालुद्दीन ने बताया, देश में कैंसर से मौतों में 22 फीसदी का कारण तंबाकू सेवन है। पिछले कुछ वर्षों में कैंसर के मामले 11 फीसदी बढ़े हैं। देश में हर साल धूम्रपान से जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए 1.8 अरब डॉलर खर्च हो रहे हैं।
17 साल तक के बच्चों को नहीं बेच सकेंगे उत्पाद
इस कानून के तहत 17 साल तक के बच्चों को धूम्रपान व अन्य तंबाकू उत्पादों से दूर रखा जाएगा ताकि सेहतमंद नई पीढ़ी तैयार हो सके। इससे सरकार को राजस्व में तगड़ा नुकसान होने की आशंका है।
राजस्व में तात्कालिक घाटा संभव
विशेषज्ञों का कहना है कि नियमन से तात्कालिक घाटा हो सकता है लेकिन भविष्य में स्वास्थ्य खर्च बचने से बड़ा फायदा होगा। 2017 में मलयेशिया सरकार को तंबाकू की बिक्री से 89.5 करोड़ डॉलर राजस्व मिला था।