टीके जीवन बचाते हैं, लेकिन दुनिया में करोड़ों बच्चों को अब भी टीका नहीं लग पा रहा है। अगर भारत की बात करें तो 2020 से पहले तक हर साल 20 से 25 फीसदी तक बच्चे टीका नहीं ले रहे थे। कोरोना महामारी में यह आंकड़ा बढ़कर 40 फीसदी तक पहुंचा, लेकिन इसके बाद सुधार भी हुआ है। हर साल 24 से 30 अप्रैल के बीच मनाए जाने वाले विश्व टीकाकरण सप्ताह का इस बार लक्ष्य भी यही बच्चे हैं, जिनके लिए थीम है ‘द बिग कैच-अप’।
सर्वाइकल कैंसर का टीका इसी साल
इसी साल के अंत तक सर्वाइकल कैंसर का टीका ‘मानव पेपिलोमावायरस’ कार्यक्रम (यूआईपी) में शामिल हो सकता है। अभी छह राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में 9-14 वर्ष की आयु की लड़कियों को यह टीका लगेगा।
एआई तकनीक...बना यू-विन
कोरोना काल में बने कोविन प्लेटफॉर्म की तरह यू-विन नाम से प्लेटफॉर्म बनाया गया है। किस गांव में कितने बच्चे टीकाकरण से दूर हैं, उनकी जानकारी एक क्लिक पर मिलेगी। फिर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उस परिवार से संपर्क करेंगे।
आईसीएमआर का ड्रोन भी तैयार
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने बताया कि पूर्वोत्तर राज्यों में ड्रोन को लेकर उनका प्रयोग सफल रहा है। जल्द ही हिमाचल, उत्तराखंड व पूर्वोत्तर राज्यों के दुर्गम स्थानों तक टीका लाने-ले जाने के लिए ड्रोन की मदद ली जाएगी।
भारत में मिशन इंद्रधनुष की वजह से 18.5 फीसदी टीकाकरण बढ़ा है। इसी से 2014 में पोलियो और 2015 में मातृ-नवजात टिटनेस उन्मूलन कर पाए।
दुनिया में 70% टीके भारत के
कोरोना महामारी में दुनिया भारत की टीका निर्माण क्षमता का गवाह बनी। वहीं, भारत खसरा, बीसीजी, डिप्थीरिया, टिटनस और पर्टुसिस (डीपीटी) जैसी बीमारियों के टीकों का लंबे समय से उत्पादन कर रहा है। डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि दुनिया में 70 फीसदी बच्चे भारत निर्मित टीका ले रहे हैं।
टीका न लेने से जान जाने का जोखिम 90% से भी ज्यादा
टीका न लेने से बच्चों को जान का जोखिम 90 फीसदी से भी ज्यादा रहता है। इन बच्चों की एंटीबॉडी विकसित नहीं हो पाती, जिससे इन्हें कुछ दिनों में ही निमोनिया की परेशानी होने लगती है। यह आगे चलकर जानलेवा हो जाता है। टीकाकरण बच्चों और वयस्कों के स्वास्थ्य की रक्षा करने का प्रभावी तरीका है।