कई उपायों का प्रस्ताव
ग्लोबल लीड, सिटी मैनेजमेंट एंड फाइनेंस, वर्ल्ड बैंक और रिपोर्ट के सह-लेखक रोलैंड व्हाइट ने कहा कि भारत सरकार निजी वित्त पोषण तक पहुंचने के लिए शहरों के सामने आने वाली बाजार से जुड़ी दिक्कतों को हटाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में कई उपायों का प्रस्ताव है जो शहर, राज्य और संघीय एजेंसियों द्वारा भविष्य को ध्यान में रख कर उठाए जा सकते हैं। इसके जरिये निजी वाणिज्यिक वित्त भारत की शहरी निवेश चुनौती के समाधान का एक बड़ा हिस्सा बन जाएगा।
सुझाव...शहरी निकायों व नगर पालिका को मजबूत बनाने की जरूरत
विश्व बैंक में भारत के कंट्री डायरेक्टर अगस्टे तानो कौमे ने कहा कि भारत के शहरों का हरित, स्मार्ट, समावेशी और टिकाऊ शहरीकरण के लिए बड़ी मात्रा में वित्त पोषण की आवश्यकता है। शहरों को सक्षम बनाने के लिए शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाना होगा। उन्हें इतना मजबूत बड़ा और क्रेडिट योग्य बनाना होगा कि वो निजी स्रोतों से अधिक उधार ले सके। इससे ही एक बढ़ती शहरी आबादी के जीवन स्तर में सुधार लाने का स्थायी तरीका खोजा जा सकता है।
- शहरी एजेंसियों की क्षमताओं का विस्तार की सिफारिश : रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को चलाने के लिए शहरी एजेंसियों की क्षमताओं का विस्तार करने की सिफारिश की गई है। वर्तमान में 10 सबसे बड़े यूएलबी हाल के तीन वित्तीय वर्षों में अपने कुल पूंजीगत बजट का केवल दो-तिहाई खर्च करने में ही सक्षम रहे हैं। स्थानीय निकायों को लेकर किसी भी तरह के ठोस नियम कायदों का न होना और राजस्व संग्रह करने की उनकी अक्षमता के चलते ही अधिक निजी वित्त पोषण नहीं हो पा रहा है।
- 2011 और 2018 के बीच, निम्न और मध्यम आय वाले देशों के सकल घरेलू उत्पाद के औसत 0.3-0.6 प्रतिशत की तुलना में शहरी संपत्ति कर सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.15 प्रतिशत था। नगरपालिका सेवाओं के लिए कम सेवा शुल्क भी उनकी वित्तीय व्यवहार्यता और निजी निवेश के प्रति आकर्षण को कम करता है। मध्यम अवधि में रिपोर्ट, कराधान नीति और राजकोषीय हस्तांतरण प्रणाली सहित संरचनात्मक सुधारों की एक श्रृंखला का सुझाव देती है। इसके जरिये शहरों को अधिक निजी वित्त पोषण का लाभ उठाने की अनुमति दी जा सकेगी।