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कानों देखी: हिमाचल में भाजपा के 'टूटे चूल्हे' पर टिका है प्रियंका का आसरा, 40 सीटें मिलने की है उम्मीद

शशिधर पाठक
Updated Mon, 14 Nov 2022 11:17 PM IST

सार

कानों देखी: भाजपा ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 के बाबत 160 प्रत्याशियों की घोषणा की। कई बड़े और पुराने नेताओं के टिकट पर कैंची चला दी गई। लेकिन गुजरात में हिमाचल की तरह बगावत और खुलेआम विद्रोह नहीं हुआ। बताते हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने यहां अपनी ताकत दिखाई है...
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अखिलेश यादव और डिंपल यादव - फोटो : Facebook/Dimple Yadav

हिमाचल में प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में बंद है। भाजपा को फिर सरकार बनाने का भरोसा है। जबकि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को भाजपा के टूटे चूल्हे से राज्य में सरकार बनाने का भरोसा है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी प्रियंका गांधी के प्रचार को बल दे दिया था। पुरानी पेंशन योजना की बहाली के संदेश ने पूरे हिमाचल के राज्य कर्मचारियों में जान फूंक रखी है। 68 विधानसभा सीटों वाले हिमाचल में भाजपा खम ठोंककर 40 की संख्या पार जाने की उम्मीद पाले बैठी है, तो अब कांग्रेस के नेता अपने जमीनी नेताओं से मिले फीडबैक के आधार पर भाजपा को 29 से ज्यादा सीटें नहीं दे पा रहे। कांग्रेस की उम्मीद इसलिए भी बची है, क्योंकि हिमाचल में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी करामात दिखाने से रह गई है। राजीव शुक्ला ने भरसक कोशिश की है। प्रियंका की जनसभाओं में भीड़ भी उमड़ी है।

मैनपुरी में डिंपल के बहाने दिल्ली में क्या चाहते हैं अखिलेश यादव

मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ताल ठोकेंगी। मीडिया इसको लेकर चाचा शिवपाल पर सवालों के तीर दाग रही है। चाचा शिवपाल को उम्मीद थी कि इस सीट पर मुलायम परिवार से ही कोई उम्मीदवार होगा। हुआ भी वही। नाम डिंपल का तय हुआ है। लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और बताई जा रही है। मुलायम परिवार के अलावा इस रहस्य को रालोद के जयंत चौधरी भी जानते हैं कि अखिलेश ने पत्नी को लोकसभा में भेजने का फैसला क्यों किया?

दरअसल सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास दिल्ली में कोई सरकारी बंगला नहीं है। जबकि उन्हें इसकी सख्त जरूरत है। उन्होंने इसी इरादे से डिंपल को राज्यसभा भेजने का मन बनाया था। हालांकि कुछ समय पहले जयंत की पत्नी चारू ने डिंपल से बात करके जयंत के खाते में ये सीट दिला दी थी। चारू और डिंपल में अच्छी निभती है। अब मुलायम के न रहने के बाद जब मैनपुरी से उपचुनाव की नौबत आयी तो अखिलेश ने इस अपरिहार्य जरूरत को साध लिया है। शिवपाल जानते हैं कि अब अखिलेश लखनऊ को छोड़ने वाले नहीं है। क्योंकि अखिलेश को पता है कि पार्टी को मजबूत बनाने के लिए लखनऊ में ही डटे रहना जरूरी है। दिल्ली की लगातार यात्रा भी जरूरी है और राजनीति को धार देने के लिए एक बंगला भी चाहिए। इस तरह से एक तीर से कई निशाने सधेंगे।

गुजरात चुनाव के बहाने संघ ने भाजपा को कराया अपनी ताकत का एहसास

भाजपा ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 के बाबत 160 प्रत्याशियों की घोषणा की। कई बड़े और पुराने नेताओं के टिकट पर कैंची चला दी गई। लेकिन गुजरात में हिमाचल की तरह बगावत और खुलेआम विद्रोह नहीं हुआ। बताते हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने यहां अपनी ताकत दिखाई है। गुजरात के राजकोट में संघ के एक बड़े नेता कहते हैं कि हमने संगठन की ताकत दिखाई है। खबर है कि संघ ने गुजरात चुनाव में स्थितियों को भांपते हुए काफी पहले से कामकाज तेज कर दिया था। हर विधानसभा क्षेत्र में तीन-चार दर्जन नेताओं-कार्यकर्ताओं, संगठन से जुड़े लोगों ने नेटवर्किंग तेज कर दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी इसे समझ रहे थे, लिहाजा भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को मजबूती के साथ तालमेल बनाने के लिए कहा गया था। सूत्र का कहना है कि नतीजा सामने है। हालांकि भाजपा के ही एक और नेता का कहना है कि इस बार के चुनाव में कोई चिंता नहीं है। कांग्रेस और आप जैसे दो दलों को भाजपा से लड़ना है। जबकि कई मोर्चे पर लड़ाई होती है तो सबको पता है कि नतीजा क्या आता है।

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अखिलेश यादव और डिंपल यादव - फोटो : Facebook/Dimple Yadav
हिमाचल में प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में बंद है। भाजपा को फिर सरकार बनाने का भरोसा है। जबकि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को भाजपा के टूटे चूल्हे से राज्य में सरकार बनाने का भरोसा है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी प्रियंका गांधी के प्रचार को बल दे दिया था। पुरानी पेंशन योजना की बहाली के संदेश ने पूरे हिमाचल के राज्य कर्मचारियों में जान फूंक रखी है। 68 विधानसभा सीटों वाले हिमाचल में भाजपा खम ठोंककर 40 की संख्या पार जाने की उम्मीद पाले बैठी है, तो अब कांग्रेस के नेता अपने जमीनी नेताओं से मिले फीडबैक के आधार पर भाजपा को 29 से ज्यादा सीटें नहीं दे पा रहे। कांग्रेस की उम्मीद इसलिए भी बची है, क्योंकि हिमाचल में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी करामात दिखाने से रह गई है। राजीव शुक्ला ने भरसक कोशिश की है। प्रियंका की जनसभाओं में भीड़ भी उमड़ी है।

मैनपुरी में डिंपल के बहाने दिल्ली में क्या चाहते हैं अखिलेश यादव

मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ताल ठोकेंगी। मीडिया इसको लेकर चाचा शिवपाल पर सवालों के तीर दाग रही है। चाचा शिवपाल को उम्मीद थी कि इस सीट पर मुलायम परिवार से ही कोई उम्मीदवार होगा। हुआ भी वही। नाम डिंपल का तय हुआ है। लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और बताई जा रही है। मुलायम परिवार के अलावा इस रहस्य को रालोद के जयंत चौधरी भी जानते हैं कि अखिलेश ने पत्नी को लोकसभा में भेजने का फैसला क्यों किया?

दरअसल सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास दिल्ली में कोई सरकारी बंगला नहीं है। जबकि उन्हें इसकी सख्त जरूरत है। उन्होंने इसी इरादे से डिंपल को राज्यसभा भेजने का मन बनाया था। हालांकि कुछ समय पहले जयंत की पत्नी चारू ने डिंपल से बात करके जयंत के खाते में ये सीट दिला दी थी। चारू और डिंपल में अच्छी निभती है। अब मुलायम के न रहने के बाद जब मैनपुरी से उपचुनाव की नौबत आयी तो अखिलेश ने इस अपरिहार्य जरूरत को साध लिया है। शिवपाल जानते हैं कि अब अखिलेश लखनऊ को छोड़ने वाले नहीं है। क्योंकि अखिलेश को पता है कि पार्टी को मजबूत बनाने के लिए लखनऊ में ही डटे रहना जरूरी है। दिल्ली की लगातार यात्रा भी जरूरी है और राजनीति को धार देने के लिए एक बंगला भी चाहिए। इस तरह से एक तीर से कई निशाने सधेंगे।

गुजरात चुनाव के बहाने संघ ने भाजपा को कराया अपनी ताकत का एहसास

भाजपा ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 के बाबत 160 प्रत्याशियों की घोषणा की। कई बड़े और पुराने नेताओं के टिकट पर कैंची चला दी गई। लेकिन गुजरात में हिमाचल की तरह बगावत और खुलेआम विद्रोह नहीं हुआ। बताते हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने यहां अपनी ताकत दिखाई है। गुजरात के राजकोट में संघ के एक बड़े नेता कहते हैं कि हमने संगठन की ताकत दिखाई है। खबर है कि संघ ने गुजरात चुनाव में स्थितियों को भांपते हुए काफी पहले से कामकाज तेज कर दिया था। हर विधानसभा क्षेत्र में तीन-चार दर्जन नेताओं-कार्यकर्ताओं, संगठन से जुड़े लोगों ने नेटवर्किंग तेज कर दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी इसे समझ रहे थे, लिहाजा भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को मजबूती के साथ तालमेल बनाने के लिए कहा गया था। सूत्र का कहना है कि नतीजा सामने है। हालांकि भाजपा के ही एक और नेता का कहना है कि इस बार के चुनाव में कोई चिंता नहीं है। कांग्रेस और आप जैसे दो दलों को भाजपा से लड़ना है। जबकि कई मोर्चे पर लड़ाई होती है तो सबको पता है कि नतीजा क्या आता है।

ओल्ड खरगे जी, ओल्ड कांग्रेस और न्यू प्रेसीडेंट का ओल्ड स्टाइल

कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड में किसी बड़े नेता द्वारा कही गई यह नई लाइन है। उनसे पूछिए की पार्टी में अध्यक्ष नए हैं, क्या बदल रहा है, तो पहले मुस्कराए। फिर बोले कि आपको भारत जोड़ो यात्रा दिखाई दे रही है। नहीं तो आप देखिए। हमारे सांसद राहुल गांधी उसी तरह फार्म में हैं। जनता उनके पीछे, नेता उनके साथ हैं। एनसीपी की सुप्रिया सूले, शिवसेना के आदित्य ठाकरे भी साथ हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण राहुल गांधी को रिसीव करने गए थे। लोग कहते थे कि चव्हाण भाजपा में जा रहे हैं और राहुल के बगल में थे। चले आइए दिल्ली देख लीजिए। फिर अविनाश पांडे और डॉ. अजय कुमार के हाथ में दिल्ली नगर निगम के चुनाव का भविष्य चल रहा है। कांग्रेस महासचिव (संगठन) के हाथ में पूरी पावर है। कुल मिलाकर ओल्ड खरगे जी, ओल्ड कांग्रेस और न्यू प्रेसीडेंट का ओल्ड स्टाइल है। बाकी जहां देखिए स्माइल ही स्माइल है।

बहनजी, ओवैसी, और केजरी...जिसे मिले ये तीन, उसको और क्या चाहिए?

विपक्ष जितना गुणा गणित करके बड़े-बड़े सपने पालता है, आखिरकार भाजपा उसके सारे अरमान अपनी एक छोटी सी राजनीतिक तैयारी से तोड़ देती है। ताजा मामला बिहार विधानसभा चुनाव का है। बिहार में गोपालगंज सीट पर राजद प्रत्याशी की जीत को लेकर जद(यू) और राजद के नेता पूरी तरह आश्वस्त थे। उम्मीदवार को लेकर भले ही सवाल थे, लेकिन राजद का मजबूत गढ़ माना जाता है। बावजूद इसके खेल हो गया। बसपा ने अपने उम्मीदवार उतारे तो ओवैसी ने भी उतार दिए। नीतीश कुमार सुशासन बाबू की छवि में फंसे थे। प्रचार करने नहीं उतरे और जीतते-जीतते राजद का उम्मीदवार कोई पौने दो हजार वोट से हार गया। इधर गुजरात में कांग्रेस जहां गहरे राजनीति अभियान चलाकर पासा पलटने की बात कर रही है, वहीं उसके आईटी सेल के नेताओं ने मानना शुरू कर दिया है कि आम आदमी पार्टी कई सीटों (कोई दो दर्जन) पर सेंध लगा सकती है।

उन्हें लगे रहने दीजिए भारत जोड़ो यात्रा पर

यह हम नहीं भाजपा के एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री कह रहे हैं। साहब का कहना है कि जब राहुल गांधी पहली बार सांसद बने थे, वह तब से उनकी राजनीति को देख रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर सूत्र का कहना है कि राहुल गांधी राजनीति में गलत समय और गलत तरीके से ऊंची आवाज में सही बात कहने के लिए जाने जाएंगे। उन्हें भारत जोड़ो यात्रा में लगे रहने दीजिए। ज्यादा नहीं बस दिसंबर महीने में ही इसका नतीजा आ जाएगा। मंत्री जी का अनुमान है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा भी फ्लॉप होने वाली है, क्योंकि गुजरात और हिमाचल दोनों भाजपा के खाते में आने वाले हैं। मजे की बात यह भी है कि जो बात भाजपा के मंत्री कह रहे हैं, यही बात कांग्रेस के भी कुछ बड़े नेताओं की जुबान पर है। यहां समझ में नहीं आता कि कांग्रेस के नेता की भाषा भाजपा के नेता बोल रहे हैं या भाजपा के नेता की भाषा कांग्रेस के धुरंधर।
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