हिमाचल में प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में बंद है। भाजपा को फिर सरकार बनाने का भरोसा है। जबकि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को भाजपा के टूटे चूल्हे से राज्य में सरकार बनाने का भरोसा है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी प्रियंका गांधी के प्रचार को बल दे दिया था। पुरानी पेंशन योजना की बहाली के संदेश ने पूरे हिमाचल के राज्य कर्मचारियों में जान फूंक रखी है। 68 विधानसभा सीटों वाले हिमाचल में भाजपा खम ठोंककर 40 की संख्या पार जाने की उम्मीद पाले बैठी है, तो अब कांग्रेस के नेता अपने जमीनी नेताओं से मिले फीडबैक के आधार पर भाजपा को 29 से ज्यादा सीटें नहीं दे पा रहे। कांग्रेस की उम्मीद इसलिए भी बची है, क्योंकि हिमाचल में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी करामात दिखाने से रह गई है। राजीव शुक्ला ने भरसक कोशिश की है। प्रियंका की जनसभाओं में भीड़ भी उमड़ी है।
मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ताल ठोकेंगी। मीडिया इसको लेकर चाचा शिवपाल पर सवालों के तीर दाग रही है। चाचा शिवपाल को उम्मीद थी कि इस सीट पर मुलायम परिवार से ही कोई उम्मीदवार होगा। हुआ भी वही। नाम डिंपल का तय हुआ है। लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और बताई जा रही है। मुलायम परिवार के अलावा इस रहस्य को रालोद के जयंत चौधरी भी जानते हैं कि अखिलेश ने पत्नी को लोकसभा में भेजने का फैसला क्यों किया?
दरअसल सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास दिल्ली में कोई सरकारी बंगला नहीं है। जबकि उन्हें इसकी सख्त जरूरत है। उन्होंने इसी इरादे से डिंपल को राज्यसभा भेजने का मन बनाया था। हालांकि कुछ समय पहले जयंत की पत्नी चारू ने डिंपल से बात करके जयंत के खाते में ये सीट दिला दी थी। चारू और डिंपल में अच्छी निभती है। अब मुलायम के न रहने के बाद जब मैनपुरी से उपचुनाव की नौबत आयी तो अखिलेश ने इस अपरिहार्य जरूरत को साध लिया है। शिवपाल जानते हैं कि अब अखिलेश लखनऊ को छोड़ने वाले नहीं है। क्योंकि अखिलेश को पता है कि पार्टी को मजबूत बनाने के लिए लखनऊ में ही डटे रहना जरूरी है। दिल्ली की लगातार यात्रा भी जरूरी है और राजनीति को धार देने के लिए एक बंगला भी चाहिए। इस तरह से एक तीर से कई निशाने सधेंगे।
भाजपा ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 के बाबत 160 प्रत्याशियों की घोषणा की। कई बड़े और पुराने नेताओं के टिकट पर कैंची चला दी गई। लेकिन गुजरात में हिमाचल की तरह बगावत और खुलेआम विद्रोह नहीं हुआ। बताते हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने यहां अपनी ताकत दिखाई है। गुजरात के राजकोट में संघ के एक बड़े नेता कहते हैं कि हमने संगठन की ताकत दिखाई है। खबर है कि संघ ने गुजरात चुनाव में स्थितियों को भांपते हुए काफी पहले से कामकाज तेज कर दिया था। हर विधानसभा क्षेत्र में तीन-चार दर्जन नेताओं-कार्यकर्ताओं, संगठन से जुड़े लोगों ने नेटवर्किंग तेज कर दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी इसे समझ रहे थे, लिहाजा भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को मजबूती के साथ तालमेल बनाने के लिए कहा गया था। सूत्र का कहना है कि नतीजा सामने है। हालांकि भाजपा के ही एक और नेता का कहना है कि इस बार के चुनाव में कोई चिंता नहीं है। कांग्रेस और आप जैसे दो दलों को भाजपा से लड़ना है। जबकि कई मोर्चे पर लड़ाई होती है तो सबको पता है कि नतीजा क्या आता है।