स्त्रीधन का शाब्दिक अर्थ होता है महिला की संपत्ति। कानूनी परिभाषा के अनुसार महिला को शादी से पहले, शादी के मौके पर या शादी के बाद मिली हुईं चीजें स्त्रीधन की श्रेणी में आती हैं। स्त्रीधन में माता-पिता, रिश्तेदारों और मित्रों की ओर से मिले उपहारों के अलावा सोने-चांदी, हीरे जवाहरात के जेवर, कैश, किसी भी प्रकार की प्रॉपर्टी या फ्लैट, घर, कार, कीमती पत्थर, बर्तन, कपड़े और जरूरत का अन्य सामान शामिल होता है।
स्त्री धन में क्या शामिल?
शादी के दौरान या उसके बाद सास-ससुर द्वारा पहनाए गए गहने और उपहार भी स्त्रीधन की श्रेणी में शामिल होते हैं। महिलाओं को बच्चे के जन्म के समय और पति की मौत के दौरान जो भी कुछ चीजें मिलती हैं, वह सभी स्त्रीधन है।
स्त्रीधन पर पति का क्या हक?
अब सवाल उठता है कि क्या स्त्रीधन पर पति का कोई हक होता है? इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला काफी अहम है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार पत्नी के स्त्रीधन पर पति का नियंत्रण नहीं हो सकता है, हालांकि यदि पति मुसीबत में हो, तो पति अपनी पत्नी के स्त्रीधन का उपयोग कर सकता है, लेकिन यहां भी एक शर्त है। यह पति की नैतिक जिम्मेदारी होगी कि मुसीबत टलने के बाद वह अपनी पत्नी को पूरा पैसा लौटा दे।
क्या कहता है कानून?
स्त्री धन को कानूनी मान्यता भी मिली हुई है। हिन्दू मैरिज एक्ट में स्त्रीधन की व्यवस्था की गई है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 27 के तहत महिला को स्त्रीधन से जुड़े अधिकार दिए गए हैं। महिला को अपनी शादी में मिले तोहफे और संपत्ति को हासिल करने का पूरा अधिकार है। अगर महिला का स्त्रीधन पति या ससुराल वालों ने अपने पास रखा हुआ है, तो वे सिर्फ उस धन के ट्रस्टी होंगे, जब भी महिला उनकी मांग करेगी, तो वे महिला को उसका स्त्रीधन लौटाना होगा।
स्त्रीधन पर महिला के क्या अधिकार?
आइए अब स्त्रीधन पर महिला के क्या अधिकार हैं, इनको भी जान लेते हैं। किसी भी महिला का स्त्रीधन उसकी संपत्ति होती है। कोई अन्य उस पर अधिकार नहीं जता सकता। महिला स्त्रीधन को अपने पास या लॉकर में सुरक्षित रख सकती है। वह अपनी मर्जी से इनका इस्तेमाल कर सकती है। महिला यदि अपना ससुराल छोड़ देती है, तो वह स्त्रीधन अपने साथ लेकर जा सकती है। यदि पति या ससुराल वाले स्त्रीधन को देने से मना करते हैं, तो इसके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज की जा सकती है।