सेना में महिला अफसरों के स्थायी कमीशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल किया है। केंद्र ने कहा कि सेना में महिला अफसरों को शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) देने में कोई भेदभाव नहीं किया जा रहा है। सभी नियमों का पालन किया जा रहा है। शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) का मामला 13 महिला अफसरों से जुड़ा है। उन्होंने स्थायी कमीशन से वंचित किए जाने को चुनौती दी है। इनमें लेफ्टिनेंट कर्नल वनीता पाधी, लेफ्टिनेंट कर्नल चंदनी मिश्रा, लेफ्टिनेंट कर्नल गीता शर्मा और अन्य अफसर शामिल हैं, जिन्होंने कठिन और संवेदनशील इलाकों में तैनाती के बावजूद स्थायी कमीशन नहीं पाया।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने केंद्र और सेना की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से सवाल पूछे। भाटी ने बताया कि स्थायी कमीशन प्रदान करने में नीतिगत निर्णय का पालन किया जा रहा है। अदालत में याचिका दायर करने वाली महिला अधिकारियों की दलीलों का विरोध करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि उन अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट वास्तव में लैंगिक रूप से तटस्थ थी, जिसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं था।
पीठ ने कहा कि महिला अधिकारियों को यह नहीं सोचना चाहिए कि उन्हें स्थायी कमीशन के लिए नहीं माना जाएगा। इस पर भाटी ने कहा कि यह धारणा बनाने का प्रयास किया गया है, लेकिन 1991 से अब तक के आंकड़े बताते हैं कि महिला अधिकारियों के साथ उनके पुरुष समकक्षों के मुकाबले भेदभाव नहीं किया गया।
उन्होंने कहा कि सेना में हम बहुत सख्त व्यवस्था का पालन करते रहे हैं और भेदभाव का कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि चयन बोर्ड के आगे अधिकारी का नाम नहीं लिखा होता। एसीआर में मानदंड नियुक्ति या कठिन क्षेत्र में पोस्टिंग पर विचार न करने के तर्कों पर विचार करते हुए भाटी ने कहा कि ऐसी नियुक्तियां महत्वहीन हैं और अधिकारियों को वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में औसत अंक दिए गए हैं।
भाटी ने कहा कि स्थायी कमीशन प्रदान करते समय एसीआर में कई पहलुओं पर विचार किया जाता है। ऐसा नहीं है कि केवल नियुक्ति के मानदंड पर ही स्थायी कमीशन दे दिया जाए। भाटी ने कहा कि एसएससी के माध्यम से नियमित अधिकारियों और संबंधित सहायक कर्मचारियों का अनुपात, वांछित 1:1 के अनुपात के विपरीत बहुत विषम है। अच्छे अधिकारियों की कमी है। 250 अधिकारियों की सीमा है। जिन्हें एसएससी बैच के अधिकारी की योग्यता के आधार पर स्थायी कमीशन देने पर विचार किया जा रहा है।
पीठ ने कहा कि नीति त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है। 80 अंक वाले कुछ एसएससी अधिकारियों को बहुत प्रतिभाशाली अधिकारियों के एक बैच से चुना जा सकता है, जबकि दूसरे बैच से 65 अंक वाले अधिकारियों को भी चुना जा सकता है।
महिला अफसरों की दलील
13 महिला अफसरों ने कहा कि महिला अफसरों को पुरुषों की तरह लगातार स्थायी कमीशन को ध्यान में रखकर आंका ही नहीं गया। 2020 से पहले महिलाएं स्थायी कमीशन के लिए पात्र नहीं थीं, इसलिए उनकी एसीआर 2019 में फ्रीज कर दी गई। इससे उनका ग्रेडिंग और रिकॉर्ड कमजोर हो गया, जबकि उन्होंने भी कठिन क्षेत्रों में वही जिम्मेदारियां निभाईं जो पुरुष अफसर निभाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, लेफ्टिनेंट कर्नल गीता शर्मा 'ऑपरेशन गलवां' में लद्दाख में कम्युनिकेशन की कमान संभाल चुकी हैं और लेफ्टिनेंट कर्नल स्वाति रावत 'ऑपरेशन सिंदूर' और जम्मू-कश्मीर के आतंक प्रभावित इलाकों में तैनात रहीं। गुरुस्वामी ने यह भी बताया कि एक महिला अफसर जिन्होंने बालाकोट एयर स्ट्राइक से विमान वापस लाए थे, उन्हें सिर्फ एक हफ्ते बाद ही सेवा छोड़ने के लिए कहा गया।
संविधान का उल्लंघन
महिला अफसरों ने दलील दी कि यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (लैंगिक भेदभाव पर रोक) का उल्लंघन है। फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाकर कहा था कि सेना में महिला अफसरों को केवल स्टाफ पदों तक सीमित रखना 'असंगत और अवैध' है। इसके बाद कोर्ट ने महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का आदेश दिया था। यह सुनवाई बुधवार को पूरी नहीं हो सकी और अब गुरुवार को जारी रहेगी। इसके बाद नौसेना और वायुसेना की महिला अफसरों की याचिकाओं पर भी सुनवाई होगी, जिन्होंने स्थायी कमीशन न मिलने को चुनौती दी है।