कोरोना को हराने में केरल मॉडल की सफलता का राज आबादी के हिसाब से डॉक्टरों और नर्सों की भारी संख्या में छिपा हुआ है। केरल में इस समय 49,927 एमबीबीएस डॉक्टर और 1,83,849 नर्सें लोगों की सेवा कर रही हैं, जबकि उसकी तुलना में बिहार जैसे बड़ी आबादी वाले राज्य में इस समय केवल 34,193 एमबीबीएस डॉक्टर, 3480 एमबीबीएस छात्र और 34,681 नर्सें ही काम कर रही हैं।
आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में इस समय 65,233 एमबीबीएस डॉक्टर, 12556 एमबीबीएस छात्र और 89967 नर्सें काम कर रही हैं। कोरोना संकट का सबसे ज्यादा नुकसान झेलने वाले महाराष्ट्र में इस समय 1.45 लाख डॉक्टर, लगभग 17 हजार मेडिकल छात्र और 1.23 लाख नर्सें लोगों की जान बचाने में जुटे हुए हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक किसी देश में एक हजार लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए न्यूनतम एक डॉक्टर होना चाहिए, जबकि देश में इस समय डॉक्टर-मरीज अनुपात लगभग 1:1445 पर बना हुआ है।
नवंबर 2019 में केंद्रीय राज्य स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने संसद में बताया था कि देश में 11,59,309 एलोपैथिक डॉक्टर रजिस्टर्ड हैं।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर इनमें कुछ डॉक्टर विदेश में रोजगार के अवसर तलाशते हैं, या अन्य सेवाओं में चले जाते हैं और 80 फीसदी भी मूल सेवा में जुड़े रहते हैं तो भी लगभग 9.27 लाख डॉक्टर इस समय लोगों की सेवा में जुटे हुए हैं।
इनके आलावा 7.88 लाख आयुर्वेद विशेषज्ञ और यूनानी चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञ भी लोगों की स्वास्थ्य सेवा में जुटे हुए हैं।
केंद्र सरकार से मिली जानकारी के मुताबिक देश में 9.27 लाख एमबीबीएस डॉक्टर इस समय लोगों का इलाज कर रहे हैं। इसके आलावा देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में कुल एक लाख 53 हजार 656 एमबीबीएस छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
ये छात्र भी रेजिडेंट डॉक्टर के रूप में लोगों की सेवा में जुड़े रहते हैं। देश में आठ लाख 32 हजार 445 आयुष विशेषज्ञ भी लोगों को सलाह दे रहे हैं।
इनके आलावा 17 लाख 48 हजार 363 नर्सें भी लोगों की सेवा करने में जुटी हैं। 11 लाख 25 हजार 222 फार्मासिस्ट लोगों को सही दवा लेने में मदद कर रहे हैं और 43,736 लैब सहायक लोगों का टेस्ट कर रहे हैं।
मुख्य अस्पतालों के आलावा देश में 201 सीपीएसई हॉस्पिटल्स, 49 ईएसआईसी हॉस्पिटल्स, 50 रेलवे हॉस्पिटल्स, 13 एचएएल हॉस्पिटल्स, 12 पोर्ट हॉस्पिटल्स में भी लोगों का उपचार किया जा रहा है।
जानकारी के मुताबिक इस समय दिल्ली में 17,996 एमबीबीएस डॉक्टर विभिन्न अस्पतालों में लोगों को सेवाएं दे रहे हैं। इनके आलावा 2530 एमबीबीएस छात्र और 43,865 नर्सें लोगों के इलाज में डॉक्टरों का सहयोग कर रही हैं। 11213 आयुष विशेषज्ञ भी लोगों को कोरोना से बचने की सलाह दे रहे हैं।
इनके आलावा दिल्ली में 27302 फार्मासिस्ट, 350 लैब सहायक, 4478 पीएमकेवीवाई प्रशिक्षित स्वास्थ्य सहायक, 5817 आशा कार्यकर्ता और 20518 आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी लोगों की मदद कर रही हैं। 83 रिटायर्ड डॉक्टरों ने भी कोरोना के आपातकाल में सरर के सामने अपनी सेवाएं देने की पेशकश की है। 812 मनोवैज्ञानिक समस्याओं से निबटने में लोगों की सहायता कर रहे हैं।
इसके आलावा सहायक स्वास्थ्य सेवाओं के 319 कर्मी, 57394 सिविल डिफेंस कर्मी, एक लाख आठ हजार 694 होम गार्ड्स और 7095 एनजीओ संगठन भी लोगों की मदद करने में जुटे हुए हैं।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के अध्यक्ष राजन शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि आने वाले समय में कोरोना का संक्रमण बेहद गंभीर स्थिति में पहुंचता दिख रहा है। संक्रमण बहुत ज्यादा बढ़ने पर लोगों का इलाज करने में मुश्किलें आ सकती हैं।
हालांकि, कोरोना में कम गंभीर लक्षणों वाले रोगियों की संख्या ज्यादा होने से इससे निपटना संभव हो सकता है, लेकिन उसके लिए अभी से युद्धस्तर पर तैयारी किये जाने की जरूरत है।
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के चेयरमैन डॉक्टर अरविंद चोपड़ा ने कहा कि मरीजों की संख्या 5.5 लाख होने पर भी हम लोगों को आवश्यक इलाज देने में सफल रहेंगे। इसका कारण यह है कि जुलाई तक 5.5 लाख कोरोना मरीजों में लगभग आधे लोग स्वस्थ हो चुके होंगे।
इसके बाद कम गंभीर लक्षण वाले और माइल्ड लक्षण वाले रोगियों की संख्या ज्यादा रहेगी। इस तरह बाकी के गंभीर और कम गंभीर रोगियों के लिए इलाज सुलभ कराया जा सकेगा।
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन को एक विशेष बैठक आयोजित कर रहा है। इस बैठक के बाद स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन से 25 हजार अतिरिक्त बेड्स मुहैया कराने के लिए कहा जा सकता है।
डॉक्टर अरविंद चोपड़ा के मुताबिक कोरोना के इलाज में डॉक्टर की कमी बड़ी समस्या नहीं बन सकती है। इसका कारण यह है कि कोरोना पीड़ितों के इलाज में डॉक्टर की भूमिका बहुत अहम नहीं होती है।
ज्यादातर रोगियों को बेहद सीमित दवाएं देनी होती हैं। उनका रक्तचाप, ऑक्सीजन लेवल और श्वसन स्तर पर निगरानी रखनी पड़ती है।
यह काम एक प्रशिक्षित नर्स आराम से कर सकती है, इसलिए कोरोना से लड़ने के लिए ऊंची स्वास्थ्य सेवाओं की अपेक्षा प्राथमिक और द्वितीयक स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता कहीं ज्यादा है।
केरल मॉडल की सफलता का राज इसी में छिपा हुआ है, जिसे सभी राज्यों को अपनाने की जरूरत है। दिल्ली का मोहल्ला क्लिनिक इसी मॉडल की कमी को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकता है। सरकार को इसे और अधिक आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।