देश में सुरंग निर्माण के दौरान हादसे कोई नई बात नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई परियोजनाओं में टनल धंसने, भूस्खलन और चट्टानें गिरने जैसी घटनाओं में मजदूरों की जान जोखिम में पड़ी है। ताजा मामला सिक्किम के नामची जिले का है, जहां निर्माणाधीन सुरंग के बाहर भूस्खलन होने से प्रवेश द्वार मलबे से बंद हो गया और कई मजदूर अंदर फंस गए।
हाल के वर्षों में ऐसे कौन-कौन सी घटनाएं हुई है? कौन-कौन से बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन हुए? ऐसे हादसे क्यों होते हैं? टनल निर्माण को लेकर सरकारी गाइडलाइन क्या कहते हैं? मजदूरों की सुरक्षा के लिए नियम क्या है? आइए जानते हैं...
ताजा मामला क्या है?
सिक्किम के नामची जिले के समरदुंग में तीस्ता स्टेज-6 जलविद्युत परियोजना के लिए बन रही निर्माणाधीन सुरंग में सोमवार दोपहर बड़ा हादसा हो गया। दोपहर करीब 3:09 बजे सुरंग के प्रवेश द्वार के पास भूस्खलन होने से भारी मात्रा में मलबा आ गिरा, जिससे अंदर काम कर रहे कई मजदूर फंस गए। हादसे की सूचना मिलते ही प्रशासन ने राहत और बचाव अभियान शुरू कर दिया। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस, अग्निशमन और आपातकालीन सेवा की टीमें मौके पर पहुंचकर अभियान में जुट गईं। बचाव अभियान के दौरान सुरंग के भीतर प्राकृतिक गैस के रिसाव की आशंका भी सामने आई, जिससे राहत कार्य और चुनौतीपूर्ण हो गया।
जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के अनुसार, बचाव अभियान के दौरान अब तक आठ शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि आशंका है कि करीब 25 से अधिक लोग अभी भी सुरंग के भीतर फंसे हो सकते हैं। यह सुरंग एनएचपीसी की तीस्ता स्टेज-6 जलविद्युत परियोजना के तहत बनाई जा रही है।
ऐसा ही मामला में उत्तराखंड में भी सामने आया था क्या?
हां, उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग में भी हाल ही में एक बड़ा हादसा हुआ था। निर्माण कार्य के दौरान सुरंग की कंक्रीट (शॉटक्रीट) की परत का एक हिस्सा अचानक टूटकर गिर गया, जिसकी चपेट में आने से झारखंड के एक युवा मजदूर की मौत हो गई। हादसा सुरंग के बड़कोट छोर से करीब 900 मीटर अंदर हुआ। घटना के बाद जिला प्रशासन और एनएचआईडीसीएल ने जांच के आदेश दिए। इसी तरह केरल के वायनाड में टनल कॉरिडोर परियोजना में भारी बारिश के बाद भूस्खलन हुआ। निर्माणाधीन सुरंग का हिस्सा दब गया और पांच से अधिक मजदूरों की मौत हो गई।
क्या ऐसे मामले पहली बार सामने आ रहे हैं?
नहीं, पहले भी इस तरह के कई सुरंग हादसे हो चुके हैं। जैसे...
- तेलंगाना (फरवरी 2025): नागरकुरनूल जिले में एसएलबीसी (SLBC) परियोजना की सुरंग का हिस्सा ढह गया था। हादसे में इंजीनियर और मजदूर सुरंग के अंदर फंस गए थे।
- उत्तरकाशी (नवंबर 2023): सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग का 57 मीटर हिस्सा ढह गया था। 41 मजदूर 17 दिनों तक अंदर फंसे रहे, जिन्हें लंबे रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद सुरक्षित बाहर निकाला गया था।
देश के बड़े टनल रेस्क्यू ऑपरेशन कौन से रहे हैं?
सिलक्यारा-बड़कोट रेस्क्यू ऑपरेशन: उत्तराखंड के उत्तरकाशी में 12 नवंबर 2023 को सिलक्यारा-बड़कोट निर्माणाधीन सुरंग का एक हिस्सा ढह गया था, जिससे 41 मजदूर अंदर फंस गए थे। इसके बाद शुरू हुआ 'ऑपरेशन सिलक्यारा' देश का सबसे लंबा टनल रेस्क्यू अभियान बना। करीब 17 दिनों तक एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी, सेना, एनएचआईडीसीएल, ओएनजीसी, आरवीएनएल, बीआरओ समेत कई एजेंसियों ने संयुक्त रूप से बचाव अभियान चलाया। शुरुआती ड्रिलिंग में कई तकनीकी बाधाएं आने के बाद अंतिम चरण में 'रैट-होल माइनर्स' ने मैन्युअल खुदाई कर फंसे मजदूरों तक रास्ता बनाया। 28 नवंबर 2023 को सभी 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
रानीगंज कोयला खदान रेस्क्यू ऑपरेशन: भारत के सबसे चर्चित बचाव अभियानों में पश्चिम बंगाल के रानीगंज कोयला खदान हादसे का नाम लिया जाता है। 13 नवंबर 1989 को महाबीर कोलियरी में अचानक पानी भर जाने से खदान में बाढ़ आ गई और 232 खननकर्मी अंदर फंस गए। बचाव दल ने तत्काल कार्रवाई करते हुए 161 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, लेकिन कई मजदूर लंबे समय तक अंदर फंसे रहे। इस हादसे में छह मजदूरों की मौत हो गई, जबकि 65 मजदूरों को सुरक्षित निकालने के लिए बड़े पैमाने पर रेस्क्यू अभियान चलाया गया। उस समय यह अभियान देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण खदान बचाव अभियानों में गिना गया।
जोजिला टनल रेस्क्यू ऑपरेशन: जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के सोनमर्ग स्थित जोजिला टनल परियोजना में 14 जनवरी 2023 को भारी हिमस्खलन के कारण निर्माण स्थल का वर्कशॉप क्षेत्र मुख्य परिसर से कट गया, जिससे 172 मजदूर वहां फंस गए। मौसम बेहद खराब होने के बावजूद भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर पुलिस और अन्य एजेंसियों के साथ संयुक्त बचाव अभियान चलाया। सेना की विशेष एवलॉन्च रेस्क्यू टीम, खोजी कुत्तों और चिकित्सा दल की मदद से अगले दिन सभी 172 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। इससे दो दिन पहले इसी क्षेत्र में एक अन्य हिमस्खलन में दो मजदूरों की मौत भी हुई थी, जिसके कारण यह अभियान और अधिक चुनौतीपूर्ण माना गया।
टनल हादसे क्यों होते हैं?
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार टनल हादसों के प्रमुख कारण ये हैं;
- निर्माण शुरू करने से पहले जमीन और चट्टानों की सही जांच न होना।
- कमजोर या भूस्खलन वाले क्षेत्रों की पहचान न होना।
- अधूरी या कमजोर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर)।
- निर्माण के दौरान वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार डिजाइन में बदलाव न करना।
- खुदाई के तुरंत बाद पर्याप्त सपोर्ट सिस्टम न लगाना।
- भूजल (पानी) के रिसाव को नियंत्रित न करना।
- लगातार निगरानी और जोखिम का आकलन न करना।
- आपातकालीन तैयारी का अभाव।
सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था होनी चाहिए?
1. रेस्क्यू कंटेनर की व्यवस्था
- टनल के फेस (जहां खुदाई चल रही हो) से 150 से 300 मीटर पीछे कम से कम एक मोबाइल रेस्क्यू कंटेनर रखा जाए।
- इस कंटेनर में कम से कम 12 मजदूरों के 24 घंटे तक सुरक्षित रहने की व्यवस्था होनी चाहिए।
- हर 2 किलोमीटर पर एक स्थायी रेस्क्यू कंटेनर बनाया जाए, जिसमें 24 मजदूरों के 24 घंटे तक जीवित रहने की व्यवस्था हो।
2. प्रत्येक शिफ्ट में निरीक्षण
हर शिफ्ट शुरू होने से पहले और हर ब्लास्ट (विस्फोट) के बाद भूवैज्ञानिक टनल की छत, दीवार और खुदाई वाले हिस्से का निरीक्षण करेंगे। अस्थिरता मिलने पर मजदूरों को उस क्षेत्र में काम नहीं कराया जाएगा।
3. जिम्मेदार अधिकारी
- परियोजना के लिए एक प्रोजेक्ट-इन-चार्ज नियुक्त होगा।
- हर जोखिम के लिए अलग जिम्मेदार अधिकारी तय किया जाएगा।
- साप्ताहिक जोखिम समीक्षा बैठक अनिवार्य होगी।
4. रेस्क्यू टीम में कितने लोग होंगे?
गाइडलाइन में रेस्क्यू टीम के लिए भी कोई निश्चित संख्या नहीं दी गई है। इसमें कहा गया है कि इंसीडेंट कमांडर और सभी बचाव एजेंसियां मिलकर तय करेंगी कि टनल के अंदर न्यूनतम कितने बचावकर्मी भेजे जाएं। जरूरत के अनुसार उनकी शिफ्ट रोटेशन भी की जाएगी, ताकि थकान के कारण कोई हादसा न हो।
5. फंसे मजदूरों के लिए व्यवस्था
अगर मजदूर टनल में फंस जाते हैं, तो उन्हें बचाव शुरू होने तक:
- पीने का पानी
- पैक किया हुआ भोजन
- दवाइयां
- प्राथमिक चिकित्सा
- पोर्टेबल शौचालय जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।