क्या सरकारी नौकरी में पदोन्नति में एससी/एसटी को आरक्षण दिया जा सकता है? अलग-अलग राज्य सरकारों की मांग अब निर्णायक मोड़ पर आ गई है। सर्वोच्च न्यायालय अब फिर से ये विचार करेगा कि क्या सरकारी नौकरी में पदोन्नति में SC/ST को आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं, भले ही इस संबंध में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर डेटा ना उपलब्ध ना हो। प्रमोशन में आरक्षण को लेकर विभिन्न हाईकोर्ट द्वारा सरकारी आदेश को रद्द करने के आदेशों के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ मामले की सुनवाई करेगी।
नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण को लेकर विभिन्न हाईकोर्ट द्वारा सरकारी आदेश को रद्द करने के आदेशों के बाद पांच जजों की संविधान पीठ मामले की सुनवाई करेगी। इस मामले से सभी राजनैतिक पार्टियां माइलेज लेने की कोशिश करती हैं तो आईये जानते हैं प्रमोशन में आरक्षण की मांग कैसे उठी और कैसे ये सियासत और अदालतों में उलझा रहा।
क्या है पेंच?
1. राज्य सरकारों की दलील है कि जब राष्ट्रपति ने नोटिफिकेशन के जरिए एससी/एसटी के पिछड़ेपन को निर्धारित किया है, तो इसके बाद पिछड़ेपन को आगे निर्धारित नहीं किया जा सकता।
2. कई न्यायिक फैसलों और बीएसपी जैसी पार्टियों के दबाव के चलते यूपीए सरकार ने संविधान में 117वें संशोधन का बिल 2012 में पेश में किया, लेकिन यह संसद में पास नहीं हो सका।
3. संविधान पीठ सरकारी नौकरियों की पदोन्नति में 'क्रीमी लेयर' के लिए एससी-एसटी आरक्षण के मुद्दे पर अपने 12 साल पुराने फैसले की समीक्षा।
4. संविधान पीठ इस बात पर भी विचार करेगी कि इस मुद्दे पर सात जजों की पीठ को पुनर्विचार करने की जरूरत है या नहीं।
5. क्या सरकारी नौकरी में पदोन्नति में एससी/एसटी को आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं, भले ही इस संबंध में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर डेटा ना हो।
प्रमोशन में आरक्षण की मांग का इतिहास :
1. एससी/एसटी को सबसे पहले 1955 में पदोन्नति में आरक्षण दिया गया था।
2. 1992 में इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया था। जिसके बाद सरकार को सरकारी नौकरियों में मिलने वाले पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगानी पड़ी।
3. 1955 में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने संविधान में 77वां संशोधन कर अनुच्छेद 16 में नई धारा 4/A को जोड़ा गया जिसके तहत एससी-एसटी प्रतिभागियों को वरियता देते हुए पदोन्नत किया जा सकता था।
4. इस नए कानून की संविधानिक वैधता को फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 2006 में एम नागराज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में न्यायालय निर्देश दिए कि प्रमोशन देने के लिए संबंधित राज्य को अनुच्छेद 335 के तहत जायज कारण बताने होंगे मसलन पिछड़ापन,प्रतिनिधित्व की कमी और प्रतिभागी की प्रशासनिक योग्यता।
5. 2010 में राजस्थान हाईकोर्ट और 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय की इसी निर्देश का पालन करते हुए पदोन्नति में आरक्षण के राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया था।
प्रमोशन में आरक्षण पर अलग-अलग विचार
1. केंद्र और राज्य सरकार- प्रमोशन में आरक्षण को लेकर लगभग सभी राज्य और केंद्र सरकार भी पक्षधर है। राजनैतिक पार्टियां आरक्षण से जुड़ी हर मांग का समर्थन करती आई हैं क्योंकि वोट बैंक उनकी कमजोरी है। और जब वो सत्ता में आ जाते हैं तो विपक्ष के दबाव में और अगली चुनाव के डर से आरक्षण देने को मजबूर हो जाते हैं।
2. सुप्रीम कोर्ट - सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि आरक्षण संविधान के मूल भावना के प्रतिकूल है । क्रिमी लेयर को छोड़ आरक्षण देने के पक्ष में न्यायालय रहा है लेकिन सरकार इसे लेकर कोई नीति-नियम में बदलाव नहीं करती।
3. समान्य वर्ग- समान्य वर्ग के लोग पदोन्नति में आरक्षण का विरोध करते हैं। सरकार द्वारा बिल को लेकर समान्य वर्ग के लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर ये बिल आया तो व्यापक आंदोलन होगा।
4. एससी-एसटी वर्ग- इस वर्ग का मानना है कि अभी भी ये वर्ग आर्थिक रुप से पिछड़ा हुआ है इसलिए पदोन्नति में भी आरक्षण मिलनी चाहिए।
आरक्षण की अधिकतम सीमा
1. 1963 में बाला जी मामले के फैसले को दोहराते हुए इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आम तौर पर 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता ।क्योंकि एक तरफ हमें मेरिट का ख्याल रखना होगा तो दूसरी तरफ हमें सामाजिक न्याय को भी ध्यान में रखना होगा।
2. लेकिन इसी मामले में जस्टिस जीवन रेड्डी ने ये साफ तौर पर कहा है कि विशेष परिस्थिति में स्पष्ट कारण दिखाकर सरकार 50 फीसदी की सीमा रेखा को भी लांघ सकती है।
3. हालांकि सामान्य तौर पर 50 फीसदी का नियम है कि इससे ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए।
क्या है आरक्षण देने का तरीका
1. राज्य अपने यहां एक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करता है ,जिसका काम राज्य के अलग अलग तबकों की सामाजिक स्थिति का ब्यौरा रखना है।
2. ओबीसी कमीशन इसी आधार पर अपनी सिफारिशें देता है।
3. मामला पूरे देश का है तो राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग अपनी सिफारिशें करे ।
4. 1993 के मंडल कमीशन केस में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने बताया था कि किस-किस आधार पर भारतीय संविधान के तहत आरक्षण दिया जा सकता है।
5. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक जाति अपने आप में कोई आधार नहीं बन सकती, दिखाना पड़ेगा कि पूरी जाति ही शैक्षणिक और सामाजिक रूप से बाकियों से पिछड़ी है।
आपको बता दें कि सभी पार्टी की सरकारें पदोन्नति में आरक्षण की पक्षधर रही हैं और इसे लागू करने की पूरी कोशिश कर रही हैं। अभी तक केंद्र सरकार और राज्य सरकारें नौकरी में पदोन्नति में आरक्षण दे रही हैं। लेकिन ये जारी रहेगा या नहीं ये संवैधीनिक पीठ तय करेगा। नौकरी में पदोन्नति में आरक्षण की मांग सरकारी ही नहीं बल्कि गैर-सरकारी नौकरियों में भी हो रही है।