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प्रणव 'दा' क्यों गए आरएसएस, कूटनीति के मास्टर का जानिए व्यक्तिगत स्वभाव

Mon, 11 Jun 2018 09:55 PM IST
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
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1969 में राज्यसभा के सदस्य के रूप में संसदीय राजनीति शुरू करने वाले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन में वह सब कुछ पाया है, जो एक राजनीतिज्ञ को मिलना चाहिए। अदब, सम्मान, शोहरत, दबदबा, रुतबा, पद सबकुछ। कामदा किंकर मुखर्जी एक स्वतंत्रता सेनानी, 1920 से कांग्रेसी और 1954 से 64 तक पश्चिम बंगाल विधान परिषद के सदस्य थे। उनके मिजाज और व्यक्तित्व के बारे में बताते समय प्रणब दा के चेहरे पर उमड़ता तेज पूर्व राष्ट्रपति के व्यक्तित्व की भी तस्वीर दिखाता है। हर पुत्र पिता के नक्शे कदम पर चलकर आगे बढऩा चाहता है। माना जाता है कि प्रणब दा कुल, परंपरा के साथ-साथ इसमें यकीन करते हैं। कांग्रेस पार्टी से राजनीति शुरू करने वाले प्रणब दा कांग्रेस के ही महान नेता के रूप में अपनी याद को जिंदा रखना चाहते हैं। 

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नाक पर गुस्सा

प्रणब दा से कुछ भी गलत या अव्यवहारिक बर्दाश्त नहीं होता। बेतुके सवाल या संदर्भ अथवा छेड़ने पर नाक में रखा गुस्सा झेलने की नौबत आनी ही है। खुद के व्यक्तित्व की डिजाइन भी उन्होंने बड़े सलीके से की है। कब, कितना और कहां बोलना है, अपने हिसाब से तय करते हैं। न बोलना चाहे तो मीडिया में अच्छे-अच्छे मुंह नहीं खुलपाए। सबसे प्रिय शब्द प्रणब दा है। दादा नमस्ते कहते ही वह मुस्कराकर अभिवादन स्वीकार कर लेते हैं। मीडिया में यह एक लिटमस टेस्ट जैसा रहा कि इससे दादा के मूड तका पता लगता है। खासकर यह कि उनसे सवाल पूछने पर जवाब मिलेगा या नहीं। करीब दो दशक के उनके राजनीतिक करियर पर नजर डालें तो वह सफाई देने में यकीन नहीं रखते थे।

पढ़ने के शौकीन

अनुशासन प्रिय प्रणब दा। सुबह-सुबह अपने लॉन में नौ किमी की दौड़ उनके स्वस्थ और चुस्त-फुर्त जीवन का राज। पहनावे और मिजाज में गजब की ठसक। पूरे एलिट क्लास की सोच। जब रक्षा मंत्री थे, तब एक बार यह जानकारी सामने आई। जब नेवल वॉर रूम लीक की घटना सामने आई और एडमिरल अरुण प्रकाश उनके सामने आए तब उनकी प्रशासनिक क्षमता को सुनने का अवसर मिला। दूसरा, प्रणब दा पढ़ने के शौकीन हैं। समय के पाबंद हैं। दफ्तर समय पर हाजिर रहना उनके स्वभाव में है। यही होता था। रक्षा मंत्री रहते हुए समय पर दफ्तर आ जाते थे। हाई प्रोफाइल मंत्री और देर तक कार्यालय में तो अफसरों का 12 बजना तय रहता था। फाइल देखते और निबटा देते। इसके बाद नई फाइल की मांग करते। एक संयुक्त सचिव के अनुसार जल्द ही इसका उपाय निकल आया। वह रोज दफ्तर आते तो करीब 100-150 पेज की मीडिया क्लिपींग उनके टेबल पर रख दी जाती थी। अखबार भी। बस दादा एक डेढ़ घंटे के लिए उसमें मस्त हो जाते थे। 
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नीति, कूटनीति के मास्टर

मूविंग इंसाइक्लोपीडिया। यह शब्द उनपर सटीक बैठता है। बात राम सेतु की है। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक चल रही थी। केन्द्रीय मंत्री टीआरबालू अपने तर्क पर अड़े थे। नौसेना की भी कुछ आपत्तियां थी। अंबिका सोनी समेत अन्य ने अपनी राय रखी। इस बीच दक्षिण भारत के सेंटिमेंट का तर्क देकर दबाव बनाने की कोशिश हुई। बैठक में प्रणब मुखर्जी भी थे। तपाक से बोल पड़े। प्रणब दा ने कहा अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने दक्षिण भारत के सेंटिमेंट को काफी करीब से देखा है। 

उनका (प्रणब) मानना है कि जितना वह इसको समझते हैं, यहां (बैठक) बैठा कोई नहीं समझता। यह कहने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री से क्षमा भी मांग ली। सब देखते रह गए। बैठक इस मुद्दे पर अनुत्तरित रह गई। यही वजह थी कि वह मनमोहन सिंह सरकार के राष्ट्रपति बनने से पहले तक संकट मोचक कहे गए। लगभग संभी मंत्रि समूहों के चेयरमैन रहे और हर संकट के समय में रीति, नीति, कूटनीति से जुड़ा त्वरित समाधान निकालने के लिए प्रस्तुत रहे। लीक पर चलने में उनका कोई सानी नहीं रहा। 

क्यों गए आरएसएस

प्रणब मुखर्जी को जानने और समझने वालों को इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं लगेगा। प्रणब दा के पास अक्सर जाने वाले एक पत्रकार मित्र के अनुसार वह विरोध को सुनते हैं। उसके तर्क को सुनते हैं। इसके लिए उनके पास बहुत धैर्य होता है। उस समय विरोधी के कुतर्क पर भी उन्हें जल्दी गुस्सा नहीं आता। दरअसल प्रणब दा का मस्तिष्क उस पूरे समय में सरल तरीके से सही पक्ष रखने का तरीका गढ़ रहा होता है। सूत्र का कहना है कि उनके पास अपने पक्ष को रखने, प्रेषित करने और लिखने का पूरा  साहस होता है। क्योंकि वह खुद को रिजर्व रखकर भारतीय संविधान के अनुरुप और कांग्रेस की विचारधारा के साथ मेल खाते उदारवादी लोकतंत्र के हिमायती हैं। इसलिए उनके करीबी आश्वस्त थे कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निमंत्रण आसानी से स्वीकार लेंगे। वहां जाएंगे। वहां ससम्मान पूरी दृढ़ता से मर्यादा में रहकर अपनी बात रखेंगे।  
 

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फिलहाल निशाने पर

प्रणब मुखर्जी की छवि पर बड़े समय बाद हमला शुरू हुआ है। कभी राजीव गांधी समय में हुआ था। फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के समय में उनका और पी चिदंबरम का मतभेद खुलकर सामने आ गया था। इसमें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को बीच बचाव करना पड़ा था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगे आना पड़ा था। इस समय वह कुछ कांग्रेसी और विरोधी, विपक्षी दलों की दु:खी आत्माओं के निशाने पर हैं। यह निशाना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पर जाने की सूचना आने के बाद से साझा जा रहा है। शिवसेना उन्हें 2019 में पूर्ण बहुमत न आने पर प्रधानमंत्री बनाये जाने की आशंका जता रही है तो कोई कुछ और बोल रहा है। लेकिन प्रणब दा को ऐसी स्थितियों, आलोचनाओं की कोई परवाह नहीं रहती। वह हमेशा आगे पीछे सबकुछ तय करके चलने के लिए जाने जाते हैं।

अलग पार्टी भी बनाई थी

दादा ने अलग राजनीतिक पार्टी भी बनाई थी। प्रणब दा के सामने यह नौबत 80 के दशक में आई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कोटरी ने प्रणब ने खिलाफ खेल कर दिया था। लिहाजा प्रणब दा को पार्टी से निकाल दिया था। तब प्रणब दा ने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया था। यह पार्टी कुछ समय तक अस्तित्व में रही और 1989 में राजीव गांधी से सहमति बन जाने के बाद न केवल प्रणब दा पार्टी में लौटे, बल्कि अपनी पार्टी का भी कांग्रेस में विलय कर दिया। वस्तुत: प्रणब दा को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का विश्वास हासिल था। 1973 में ही प्रणब दा इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में केन्द्रीय उपमंत्री हो गए थे। इंदिरा जी की हत्या से पहले तक उनकी सरकार में स्थिति दबदबे वाली थी। नंबर दो समझे जाते थे। तमाम मामलों के केन्द्रीय मंत्री रहे। इंदिरा जी के मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री के रूप में काफी चर्चित रहे। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कर्ज की आखिरी किस्त न अदा कर पाना भी चर्चित पक्ष था। प्रणब मुखर्जी के 80 के दशक में वित्तमंत्री रहने के दौरान ही मनमोहन सिंह रिजर्व बैंक के गवर्नर थे।  

फिर चमका भाग्य 

दादा के जीवन में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव दूसरा सुनहरा अवसर लेकर आए थे। नरसिंह राव के समय में प्रणब मुखर्जी को योजना आयोग के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। बाद में दादा केन्द्रीय मंत्री बनाए गए। 1995-96 में वह पहली बार विदेश मंत्री बने थे। इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2004 में यूपीए सरकार के सत्ता में आने के बाद वह पहले रक्षा मंत्री बने। बाद में विदेश मंत्री बने। विदेश मंत्री रहने के दौरान ही अमेरिका के साथ परमाणु करार हुआ। 10 अक्टूबर 2008 को अमेरिका की विदेश मंत्री कोंडलीजा राइस के साथ उन्होंने परमाणु करार के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया। बाद वह देश के वित्त मंत्री बने और देश का 13वां राष्ट्रपति बनने से पहले वह इसी पद पर रहे। 

नेहरू और इंदिरा की छाप

प्रणब मुखर्जी के व्यक्तित्व पर उन्हें करीब से मानने वालों का कहना है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व की छाप पड़ी है। वह नेहरुइज्म से कुछ ज्यादा प्रभावित लगते हैं। इंदिरा गांधी की जन्मशती पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने काफी गहराई से अपनी राय रखी थी। वहीं पंडित जवाहर लाल नेहरू के बारे में बोलते हुए उनकी जुबान पर गर्वीलापन और पंडित जी के प्रति सम्मान साफ झलकता है। अभी भी प्रणब दा कांग्रेस पार्टी के सबसे अच्छे सलाहकार माने जाते है। उनके कार्यालय के सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रणब मुखर्जी से मिलने जाते हैं। कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद और कुछ अन्य नेता भी जाते रहते हैं। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी से उनकी बात होती है। इसके साथ-साथ प्रणब मुखर्जी पूर्व राष्ट्रपति की मर्यादा और आदर्श छवि को बनाए रखते हैं। 
जीवन परिचय

वकील, अध्यापक, पत्रकार और फिर राजनीतिज्ञ प्रणब मुखर्जी जीवन में संतुलित रहने के लिए जाने जाते हैं। तोलकर बोलना और सीमित मित्रता का व्यवहार रहा है। इतिहास और राजनीति विज्ञान में परास्नातक, कानून की पढ़ाई पूरी करके डिग्री हासिल करने वाले प्रणब दा डी लिट भी हैं। 11 दिसंबर 1953 को वीरभूमि जिले के मिराती गांव(पंश्चिम बंगाल) में जन्मे प्रणब दा पहला चुनाव 2004 में जंगीपुर लोकसभा सीट से लड़कर जीता था। अब जंगीपुर से उनकी सीट का प्रतिनिधित्व बेटे अभिजीत मुखर्जी कर रहे हैं। 
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