प्रणब मुखर्जी की छवि पर बड़े समय बाद हमला शुरू हुआ है। कभी राजीव गांधी समय में हुआ था। फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के समय में उनका और पी चिदंबरम का मतभेद खुलकर सामने आ गया था। इसमें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को बीच बचाव करना पड़ा था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगे आना पड़ा था। इस समय वह कुछ कांग्रेसी और विरोधी, विपक्षी दलों की दु:खी आत्माओं के निशाने पर हैं। यह निशाना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पर जाने की सूचना आने के बाद से साझा जा रहा है। शिवसेना उन्हें 2019 में पूर्ण बहुमत न आने पर प्रधानमंत्री बनाये जाने की आशंका जता रही है तो कोई कुछ और बोल रहा है। लेकिन प्रणब दा को ऐसी स्थितियों, आलोचनाओं की कोई परवाह नहीं रहती। वह हमेशा आगे पीछे सबकुछ तय करके चलने के लिए जाने जाते हैं।
अलग पार्टी भी बनाई थी
दादा ने अलग राजनीतिक पार्टी भी बनाई थी। प्रणब दा के सामने यह नौबत 80 के दशक में आई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कोटरी ने प्रणब ने खिलाफ खेल कर दिया था। लिहाजा प्रणब दा को पार्टी से निकाल दिया था। तब प्रणब दा ने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया था। यह पार्टी कुछ समय तक अस्तित्व में रही और 1989 में राजीव गांधी से सहमति बन जाने के बाद न केवल प्रणब दा पार्टी में लौटे, बल्कि अपनी पार्टी का भी कांग्रेस में विलय कर दिया। वस्तुत: प्रणब दा को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का विश्वास हासिल था। 1973 में ही प्रणब दा इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में केन्द्रीय उपमंत्री हो गए थे। इंदिरा जी की हत्या से पहले तक उनकी सरकार में स्थिति दबदबे वाली थी। नंबर दो समझे जाते थे। तमाम मामलों के केन्द्रीय मंत्री रहे। इंदिरा जी के मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री के रूप में काफी चर्चित रहे। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कर्ज की आखिरी किस्त न अदा कर पाना भी चर्चित पक्ष था। प्रणब मुखर्जी के 80 के दशक में वित्तमंत्री रहने के दौरान ही मनमोहन सिंह रिजर्व बैंक के गवर्नर थे।
फिर चमका भाग्य
दादा के जीवन में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव दूसरा सुनहरा अवसर लेकर आए थे। नरसिंह राव के समय में प्रणब मुखर्जी को योजना आयोग के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। बाद में दादा केन्द्रीय मंत्री बनाए गए। 1995-96 में वह पहली बार विदेश मंत्री बने थे। इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2004 में यूपीए सरकार के सत्ता में आने के बाद वह पहले रक्षा मंत्री बने। बाद में विदेश मंत्री बने। विदेश मंत्री रहने के दौरान ही अमेरिका के साथ परमाणु करार हुआ। 10 अक्टूबर 2008 को अमेरिका की विदेश मंत्री कोंडलीजा राइस के साथ उन्होंने परमाणु करार के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया। बाद वह देश के वित्त मंत्री बने और देश का 13वां राष्ट्रपति बनने से पहले वह इसी पद पर रहे।
नेहरू और इंदिरा की छाप
प्रणब मुखर्जी के व्यक्तित्व पर उन्हें करीब से मानने वालों का कहना है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व की छाप पड़ी है। वह नेहरुइज्म से कुछ ज्यादा प्रभावित लगते हैं। इंदिरा गांधी की जन्मशती पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने काफी गहराई से अपनी राय रखी थी। वहीं पंडित जवाहर लाल नेहरू के बारे में बोलते हुए उनकी जुबान पर गर्वीलापन और पंडित जी के प्रति सम्मान साफ झलकता है। अभी भी प्रणब दा कांग्रेस पार्टी के सबसे अच्छे सलाहकार माने जाते है। उनके कार्यालय के सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रणब मुखर्जी से मिलने जाते हैं। कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद और कुछ अन्य नेता भी जाते रहते हैं। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी से उनकी बात होती है। इसके साथ-साथ प्रणब मुखर्जी पूर्व राष्ट्रपति की मर्यादा और आदर्श छवि को बनाए रखते हैं।
जीवन परिचय
वकील, अध्यापक, पत्रकार और फिर राजनीतिज्ञ प्रणब मुखर्जी जीवन में संतुलित रहने के लिए जाने जाते हैं। तोलकर बोलना और सीमित मित्रता का व्यवहार रहा है। इतिहास और राजनीति विज्ञान में परास्नातक, कानून की पढ़ाई पूरी करके डिग्री हासिल करने वाले प्रणब दा डी लिट भी हैं। 11 दिसंबर 1953 को वीरभूमि जिले के मिराती गांव(पंश्चिम बंगाल) में जन्मे प्रणब दा पहला चुनाव 2004 में जंगीपुर लोकसभा सीट से लड़कर जीता था। अब जंगीपुर से उनकी सीट का प्रतिनिधित्व बेटे अभिजीत मुखर्जी कर रहे हैं।