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अंग्रेजी थोपने का विरोध क्यों नहीं कर रही राष्ट्रवादी सरकार: डॉ. वेद प्रताप वैदिक

Wed, 19 Jun 2019 12:05 PM IST
आसिम खान डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
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डॉ. वेद प्रताप वैदिक (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media
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भारतीय भाषाओं के जानकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने कहा है कि आज देश में राष्ट्रवादी सरकार है जो हमेशा हिंदी के उत्थान की बात करती रही है, लेकिन आज जबकि वह पूर्ण ताकत के साथ सत्ता में है, वह ऐसा कोई भी कदम नहीं उठा रही है जिससे हिंदी के महत्त्व में वृद्धि हो। उनका आरोप है कि सरकार आज हिंदी भाषी राज्यों पर अंग्रेजी थोपने का भी कोई विरोध नहीं कर रही है। तमिलनाडु जैसे राज्यों में हिंदी को अनिवार्य किये जाने के मुद्दे पर अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति पर जब कोई चीज थोपी जाती है तो वह उसका विरोध करता है। 

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भाषाओं के मामले में क्षेत्रीय संवेदनाओं के जुड़ने के कारण यही बात और अधिक उग्र हो जाती है। यही कारण है कि किसी भी देशवासी पर कोई भी भाषा थोपनी नहीं चाहिए और वे इसका विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए एक सकारात्मक माहौल दिया जाना चाहिए जिससे लोग अपनी रुचियों और जरूरतों के मुताबिक़ कोई भी भाषा सीखें।

भारतीय भाषाओं के सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने मंगलवार को एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कहा कि दक्षिण भारतीय राज्यों पर हिंदी थोपने का वे विरोध करते हैं, लेकिन उतना ही विरोध वे उत्तर भारत के छात्रों पर अंग्रेजी के थोपने का भी करते हैं। डॉक्टर वैदिक ने स्पष्ट किया कि वे अंग्रेजी सीखने के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अगर यही चीज थोपी जाती है तो वे उसके सबसे बड़े विरोधी हैं। 
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नई भाषा नीति में यह बात लिखी गई है और वे इसका बहुत सम्मान करते हैं कि अंग्रेजी थोपने के उसके अपने अनेक नुक्सान हैं जिनसे बचा जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य है कि स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली सरकार भी अंग्रेजी को थोपने की मानसिकता का कोई विरोध नहीं कर रही है। डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने कहा कि न्यायालय हो या अन्य उच्च संस्थान, अघोषित रूप से वहां अंग्रेजी को थोप दिया गया है, उसका वर्चस्व स्वीकार कर लिया गया है। 

इससे हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओँ का महत्त्व कम हो रहा है। लेकिन अगर इस तरह की अनिवार्यता खत्म कर दी जाती है तो स्वाभाविक रूप से इससे भारतीय भाषाओं का महत्त्व बढ़ेगा। इससे भारत के एक प्रांत के लोग दूसरे प्रान्तों की भाषाओँ को स्वयं सीखने को प्रेरित होंगे और इससे किसी के बीच कोई टकराव भी नहीं होगा लेकिन दुर्भाग्य है कि इस तरफ कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। 

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