केंद्र सरकार में सेवारत और रिटायर होने के बाद अनेक आईपीएस व आईएएस अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद नया पद दे दिया जाता है। इन नौकरशाहों को सेवा विस्तार भी आसानी से मिल जाता है। चाहे इनके पास तकनीकी योग्यता न हो, इसके बावजूद ये अधिकारी ऐसे आयोग व बोर्ड के सदस्य और अध्यक्ष बनने में कामयाब हो जाते हैं। दूसरी तरफ केंद्रीय अर्धसैनिक बलों यानी सीएपीएफ में 35 साल की सेवा के बाद रिटायर हुए कैडर अधिकारियों को कोई नहीं पूछता। उनकी विशेषज्ञता पर पर्दा डाल दिया जाता है। रिटायरमेंट के बाद ये अधिकारी गुमनामी में जीवन बिताते हैं।
बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद ने इस मामले में खेद प्रकट करते हुए कहा कि केंद्र सरकार कैडर अफसरों की तरफ नहीं देखती। ये वो अधिकारी होते हैं जो एक बल में औसतन 35 साल से अधिक समय तक अपनी सेवा देते हैं। उसके बाद जब इन बलों के लिए विशेषज्ञ या सलाहकार की जरुरत होती है तो वहां आईपीएस या आईएएस अधिकारी को बैठा दिया जाता है। खास बात है कि कैडर अफसर के मुकाबले इन अधिकारियों के पास मुश्किल से चार पांच साल का फ़ील्ड अनुभव भी नहीं होता।
बता दें कि केंद्र सरकार में दर्जनों ऐसे महकमे हैं, जहां आईएएस-आईपीएस को पोस्ट रिटायरमेंट पद दे दिया जाता है। मौजूदा समय में केंद्रीय जांच एजेंसियों और सीएपीएफ से रिटायर्ड होने वाले कई अधिकारी पोस्ट रिटायरमेंट पद पर विराजमान हैं। पूर्व आईपीएस अजीत डोभाल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर हैं तो वहीं पूर्व आईपीएस शरद कुमार केंद्रीय सतर्कता आयोग में आयुक्त के पद पर रह चुके हैं। सीआरपीएफ के पूर्व डीजी राजीव राय भटनागर, जिन्हें रिटायरमेंट के तत्काल बाद जम्मू-कश्मीर के एलजी के सलाहकार के पद पर पदस्थ कर दिया गया।
पूर्व आईपीएस के. विजय कुमार रिटायरमेंट के करीब आठ साल बाद भी केंद्रीय गृह मंत्रालय में सलाहकार के पद पर काम कर रहे हैं। पूर्व आईबी चीफ राजीव जैन और रॉ चीफ अनिल धस्माना को रिटायरमेंट के समय छह माह का सेवा विस्तार दे दिया गया। रिटायरमेंट के बाद धस्माना को एनटीआरओ का चेयरमैन बना दिया गया। इस सूची में कई दूसरे आईपीएस अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं, पोस्ट रिटायरमेंट पद मिला है। कुछ आईपीएस अफसर एलजी और राज्यपाल जैसे बड़े ओहदे तक भी पहुंच जाते हैं। दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त आईपीएस बीएस बस्सी को सेवानिवृत्ति के बाद यूपीएससी का सदस्य लगाया गया है।
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद कहते हैं कि देश में सीएपीएफ के कैडर अफसरों पर किसी का फोकस नहीं है। उनके पास 35 साल का विशेष अनुभव होता है, मगर उन्हें कोई नहीं पूछता। एक आईपीएस अफसर किसी बल में दो चार साल के लिए आता है और उसे रिटायरमेंट के बाद केंद्र सरकार में बड़ा ओहदा मिल जाता है।
यहां बात ओहदे की नहीं है, बकौल सूद बात है विशेषज्ञता की। एक कैडर अफसर करीब तीन दशक बॉर्डर सेवा में लगाता है। अब आप देखें कि उसके मुकाबले दो चाल साल की सेवा वाले अधिकारियों को उसी बॉर्डर पर रणनीति या तकनीकी उपकरण खरीदने वाली कमेटी का अध्यक्ष बना दिया जाता है। आईपीएस है तो वह रिटायरमेंट के बाद तकनीकी विशेषज्ञता न होते हुए भी तकनीकी पद पर बैठ सकता है। दूसरी तरफ, जो अधिकारी सारी उम्र जिस सेवा में लगा देते हैं, उनकी दक्षता को कोई पूछने वाला नहीं है।
एसके सूद बताते हैं कि इसका बड़ा कारण है राजनीतिक संबंध न होना। कैडर अधिकारी तो सारी उम्र बॉर्डर पर या दूसरी फील्ड ड्यूटी में लगा रहता है। उसके संबंध कहां से बनेंगे। दिल्ली में पोस्टिंग लेने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। दूसरी ओर आईपीएस हैं, जो जब चाहते हैं दिल्ली में आ सकते हैं। यहां उनके कांटेक्ट बन जाते हैं। ये कांटेक्ट रिटायरमेंट के बाद उन्हें फायदा दिलाते हैं। कम से कम बॉर्डर मेनेजमेंट, नक्सल और आतंकी ऑपरेशन में पूर्व कैडर अफसरों की विशेषज्ञता का लाभ उठाया जा सकता है। अफसोस की बात है कि यहां पर भी आईपीएस अफसरों की सलाह ली जाती है। कैडर अफसरों को न तो सेवा विस्तार और न ही पोस्ट रिटायरमेंट पद मिलता है।
सूद का कहना है कि केंद्र सरकार को सोचना चाहिए कि अर्धसैनिक बलों में कोई नीति बनाने से पहले वहां कई दशकों तक काम कर चुके कैडर अधिकारियों की सलाह ली जाए।