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ELECTION ANALYSIS: केजरीवाल क्यों नहीं मार पाए छक्का?

Tue, 14 Mar 2017 03:05 PM IST
अभय कुमार दुबे / राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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आम आदमी पार्टी पंजाब विधानसभा चुनाव के मैच में आखिरी गेंद पर छक्का मार कर जीतना चाहती थी, पर वह केवल चौका मार पाई। नतीजतन वह रनर अप रही। अमरिंदर सिंह की कुशल रणनीति ('आप' को माँझा और दोआबा में पैर न जमाने देना और मालवा में भी उसे एक कहीं छोटे इलाके में सीमित कर देना) और अकाली दल के उम्मीद से कहीं अच्छे प्रदर्शन ने उसके वोट प्रतिशत को 2014 से आगे नहीं जाने दिया।
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इस निराशा के बावजूद यह अपने आप में यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है, क्योंकि अब उसे अगले पाँच साल तक विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभाने का श्रेय मिलेगा। कांग्रेस के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को भीषण घाटे में डूबी हुई एक ऐसी अर्थव्यवस्था मिलेगी जिसे दुरुस्त करना कांग्रेस सरकार के लिए खजाना खाली होने के कारण बहुत मुश्किल होगा।
 

कांग्रेस सरकार

केजरीवाल की पार्टी ने अगर विपक्ष की भूमिका ठीक से निभाई तो वह अगले चुनाव से पहले ही अपनी जमीन को पुख्ता कर सकती है। इससे पहले कि कांग्रेस सरकार की विफलताओं के कारण अकाली दल को दोबारा उभरने का मौका मिले, आम आदमी पार्टी कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभर सकती है। लेकिन ऐसा करने के लिए उसे अपनी उस सबसे बड़ी कमी की भरपाई करनी होगी जिसके कारण वह छक्का नहीं मार पाई। यह कमी है पार्टी के पास एक पंजाबी (सिख) केजरीवाल के न होने की।

पंजाब में 'आप'

दिल्ली से आए हुए केजरीवाल पगड़ी पहन कर और हिंदी में भाषण दे कर पार्टी को केवल रनर अप ही बनवा सकते थे। बिना स्थानीय नेतृत्व का विकास किए पंजाब में आम आदमी पार्टी अपनी सम्भावनाओं को जमीन पर नहीं उतार सकती। यह कमी न तो भगवंत मान पूरी कर सकते हैं, न ही एच।एस। फुल्का और न ही गुरप्रीत सिंह। यह ठीक है कि भगवंत और गुरप्रीत के कॉमेडी टैलेंट का पार्टी को लाभ हुआ है पर यह दल पंजाबी कॉमेडियनों और दिल्ली से आए नेताओं व चुनाव प्रबंधकों की पार्टी बन कर नहीं रह सकती।
 

विधायक दल

उसे एक नेता चाहिए और इसी दृष्टिकोण से 'आप' के विधायक दल के नेता का चुनाव होना चाहिए। पंजाब में अपेक्षित नतीजे न निकाल पाने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि इस पार्टी को वहाँ रिमोट कंट्रोल से चलने वाले संगठन के रूप में देखा जाने लगा था। पार्टी अगर पंजाब में कांग्रेस को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाती तो केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के प्रमुख विपक्षी की छवि मिल सकती थी। दूसरे, इस जीत से उसकी दिल्ली की राजनीति को भी एक नया उछाल मिलता।

जबरदस्त पराजय

चूँकि पंजाब में ऐसा नहीं हो सका और गोवा में उसके नतीजे सिफर निकले, इसलिए अब उसे एक उल्टी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। उसके विरोधियों और आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया है कि इस पार्टी के लिए आगे का रास्ता बंद हो चुका है। हालाँकि ये वही विरोधी हैं जिन्होंने लोकसभा चुनाव में उसकी जबरदस्त पराजय के बाद उसका शोकगीत लिख दिया था। पर आम आदमी पार्टी ने विधानसभा में ऐतिहासिक जीत दर्ज करके सभी को गलत साबित कर दिया।

एमसीडी चुनाव

'आप' एक बार फिर अपनी आसन्न मृत्यु का घोषणा करने वालों को गलत साबित कर सकती है, बशर्ते वह अप्रैल के मध्य में होने वाले राजधानी के तीनों नगर निगमों में जबरदस्त जीत हासिल करके दिखाए। ऐसा उसे करना ही होगा। भाजपा इस समय नगर निगम की राजनीति में दस साल की एंटीइनकम्बेंसी का सामना कर रही है।

उसने अपनी एंटीइनकम्बेंसी को बेअसर करने के लिए रणनीतिक रूप से तय कर लिया है कि वह मौजूदा पार्षदों को टिकट नहीं देगी ताकि वॉर्ड स्तर पर काउंसिलरों के खिलाफ जड़ जमा चुकी नाराजगी से बचा सके। प्रदेश अध्यक्ष स्तर पर भाजपा पहले ही बदलाव कर चुकी है और उसके नए अध्यक्ष ने झुग्गियों और पुनर्वास कॉलोनियों में अपना डेरा डाला है ताकि 'आप' के जनाधार में सेंध लगाई जा सके।
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पंजाब की कामयाबी

जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है, वह संगठन और हौसले के लिहाज से पस्त हालत में है। उसका नेतृत्व चमकदार नहीं है। इसके बावजूद अगर कांग्रेस ने निगम चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर दिया तो उसे पंजाब की कामयाबी के बाद उसी सिलसिले में उसका दूसरा छक्का माना जाएगा। साथ ही यह भी मान लिया जाएगा कि भाजपा के खिलाफ कांग्रेस की जगह लेने की केजरीवाल की कोशिशें अपनी क्षमताओं से ज्यादा हासिल करने की कोशिश ही है।

इसलिए नगर निगम के चुनाव में 'आप' चौका लगा कर काम नहीं चला सकती। जीत और प्रभावशाली जीत के बिना न केवल पंजाब की निराशा नहीं धुलेगी, वरन दिल्ली की राजनीति में भी उसके प्रभाव में गिरावट आनी शुरू हो सकती है। इसके अलावा 'आप' को अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को स्पर्श देने का एक और मौका अक्टूबर में गुजरात विधानसभा चुनावों में मिलेगा।

मोदी के गृह प्रदेश में भाजपा इस समय पटेलों, दलितों और मुसलमानों के संयुक्त मोर्चे के अंदेशों का सामना कर रही है। उसके खिलाफ़ दो दशक से ज्यादा के लगातार शासन की एंटीइनकम्बेंसी भी है। इस परिस्थिति का लाभ उठाने के लिए वहाँ कांग्रेस अच्छी हालत में नहीं है। पंजाब की तरह गुजरात भी 'आप' के दाँव की प्रतीक्षा कर रहा है।

(अभय कुमार दुबे विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में प्रोफ़ेसर और भारतीय भाषा केंद्र के निदेशक हैं।)




 
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