प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उनकी प्रभावशाली वाकपटुता भी है। अमेरिकी कांग्रेस में दिया पीएम मोदी का भाषण हो या अन्य अवसरों पर जनता से सीधा संबोधन, उनके भाषणों की तासीर खुद-ब-खुद लोगों को अपनी ओर खींच लेती है। हकीकत कुछ और है, पीएम मोदी के मुंह से निकलने वाले शब्द उनके नहीं, बल्कि कई लोगों के विश्लेषण से पैदा होते हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक पीएम मोदी के भाषणों में शब्द पिरोने का काम पार्टी की इकाइयों, मंत्रालयों, विषय विशेषज्ञों, प्रवासी भारतीयों के संगठन और उनकी खुद की टीम के लोग करते हैं।
पीएम मोदी की सार्वजनिक छवि उभरने का अध्ययन करने वाले समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन के मुताबिक पीएम मोदी के भाषण दरअसल एक सामूहिक उपलब्धि होते जिनका क्रेडिट केवल उन्हें ही मिलता है।
'पीएम मोदी के भाषण लिखने वालों को ऑस्कर मिलना चाहिए'
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विश्वनाथन कहते हैं कि मोदी के भाषणों को तैयार करने वाले लोगों को उनकी प्रतिभा के लिए ऑस्कर से नवाजा जाना चाहिए।
अमेरिका में भाषण लेखक फैंकलिन डी रूजवेल्ट के समय से राष्ट्रपति घेरे के हिस्सा रहे हैं। जॉन एफ केनेडी, रिचर्ड निक्सन, रोनाल्ड रीगन, बराक ओबामा सभी अपने भाषणों को प्रभावी बनाने के लिए पेशेवर भाषण लेखकों को अपने साथ रखते हैं।
भारत में उनकी (पेशेवर भाषण लेखक) मौजूदगी प्रेतों की तरह होती है, उनके लिखे शब्द बोले जाते हैं, लेकिन वे खुद नहीं दिखाई देते हैं। राजनेता कभी नहीं चाहते कि उनके भाषण तैयार करने वाले कभी सामने आएं और यह बात उन लेखकों को भी भली-भांति पता होती है।
भाषण लेखकों को नेता के बयानबाजी कौशल को ध्यान में रखते हुए भाषण तैयार करना होता है। ये भी ध्यान रखना होता है कि नेता किसी जनसभा में बोलने वाला या किसी सरकारी जरूरत के मुताबिक बोलने वाला है।
जानिए कौन लिखता था पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के भाषण?
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बेशक पीएम मोदी भी पूर्व नेताओं की तरह ही भाषण तैयार करते हैं, लेकिन 2013 में स्वतंत्रता दिवस से पहले जिस प्रकार उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भाषण को लेकर खुली चुनौती दी थी, उसे उनकी ही दिमागी उपज माना जाता है।
मोदी ने कहा था कि देश उनके और पीएम के भाषण की तुलना करेगा। उन्होंने कहा था कि 15 अगस्त को देश की जनता दो भाषण सुनेगी, मैं भुज के लालन कॉलेज से भाषण दूंगा, दूसरा भाषण लालकिले से दिया जाएगा। इसके बाद देश मेरे और पीएम के भाषण की तुलना करेगा, तुलना होगी वादा बनाम काम पर, तुलना होगी आशा बनाम निराशा पर। मोदी के तब के इस भाषण को जानकारों नें पीएम पद की रेस में रहते हुए बड़बोलापन करार दिया था। लेकिन उनके इस भाषण ने लोगों का ध्यान खूब खींचा था।
वहीं, मोदी से पहले प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह को भी बहुत अच्छे वक्ता के तौर पर नहीं देखा जाता रहा है, फिर भी बोलते रहते थे। यूपीए1 की सरकार के दौरान संजय बारू चार साल तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे, वे दावा करते हैं कि उन्होंने मनमोहन सिंह के लिए उस दौरान एक हजार भाषण लिखे थे।