मुंबई से जुड़े भाजपा के एक नेता के मुताबिक, दोनों दलों में किसी तरह का तनाव नहीं है। लेकिन मुख्यमंत्री पद पर उसका दावा ज्यादा मजबूत होगा जो विधानसभा में ज्यादा सीटें जीतकर लाता है। इसके पहले बाला साहब ठाकरे और अटल बिहारी वाजपेयी के समय भी यह फार्मूला कारगर साबित हुआ था और शिवसेना की तरफ से मनोहर जोशी को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया गया था। उस समय 1995 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने 73, जबकि भाजपा ने 65 सीटों पर जीत दर्ज की थी। ज्यादा विधायकों के कारण बिना ज्यादा मतभेद शिवसेना को मुख्यमंत्री पद दिया गया था। नेता के मुताबिक, यही फॉर्मूला इस चुनाव में भी कारगर हो सकता है।
नेता के मुताबिक, लोकसभा चुनाव ने नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर मुहर लगा दी है। यही कारण है कि दोनों दल नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर ही विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। यही कारण है कि अब उद्धव ठाकरे के सुर बदल गए हैं और वे भी अब मोदी राग अलापने में लग गए हैं। उद्धव ठाकरे ने हाल ही में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह से ही उम्मीद जताई है। ठाकरे ने मोदी से अयोध्या मसले का हल कानून बनाकर निकालने की मांग की है। रविवार को अपने सांसदों के साथ अयोध्या में रामलला का दर्शन करने के बाद भी उद्धव ठाकरे ने इसी रुख को दोहराया।
शिवसेना ने लोकसभा में अपने लिए डिप्टी स्पीकर के पद की मांग की थी। उसे इस पद के लिए भी अभी तक केंद्र से कोई सकारात्मक रुख नहीं मिला है। यही कारण है कि शिवसेना अपनी ताकत राज्य में दिखाना चाहती है। इसी नजरिये से उसने मुख्यमंत्री पद पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। लेकिन ज्यादा विधायकों के फार्मूले के मुताबिक, अब दोनों दलों का ध्यान ज्यादा से ज्यादा सीटों को जीतने पर है।