रखाइन प्रांत से क्यों भागे रोहिंग्या
म्यांमार में मौंगडोव सीमा पर 25 अगस्त 2017 को रोहिंग्या चरमपंथियों ने उत्तरी रखाइन में पुलिस नाके पर हमला कर 12 सुरक्षाकर्मियों को मार दिया था। इस हमले के बाद सुरक्षा बलों ने मौंगडोव जिला की सीमा को पूरी तरह से बंद कर दिया और बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया और तब से म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन जारी है।
आरोप था कि सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों को वहां से खदेड़ने के मकसद से उनके गांव जला दिए और नागरिकों पर हमले किए। हिंसा के बाद से करीब चार लाख रोहिंग्या शरणार्थी सीमा पार करके बांग्लादेश में शरण लिया। म्यामांर के सैनिकों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के संगीन आरोप भी लगे। सैनिकों पर प्रताड़ना, बलात्कार और हत्या जैसे आरोप लगते रहे। हालांकि सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था।
वर्षों से जारी है रोहिंग्या के खिलाफ हिंसा
वैसे तो रखाइन प्रदेश में सालों से रोहिंग्याओं को हासिए पर रखा गया। उनके खिलाफ सैन्य कार्रवाई तक की गई। तनाव और हिंसा इतनी बढ़ी कि सैकड़ों- हजारों रोहिंग्याओं को म्यांमार छोड़ कर बांग्लादेश और पाकिस्तान में शरण लेनी पड़ी। साल 2012 में एक बौद्ध के साथ हुए बलात्कार और हत्या के बाद से मुस्लिमों के खिलाफ लगातार हमले हुए।
हिंसा इतनी बढ़ गई कि सेना ने बड़े स्तर पर कार्रवाई की, रोहिंग्या महिलाओं के साथ अत्याचार हुए, लोगों को घर से निकालकर मारा गया नतीजतन सैकड़ों लोग पलायन को मजबूर हुए।
भारत में कोई शरणार्थी कानून नहीं
भारत ने अभी तक संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधी 1951 पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इसके अलावा 1967 में लाए गए इसके प्रोटोकॉल का भी हिस्सा नहीं है। भारत अनौपचारिक और अलग-अलग मामलों के हिसाब से शरणार्थियों के आवेदन पर फैसला लेता रहा है।
भारत की तरफ से शरण की अनुमति मिलने के बाद शरणार्थियों को लांग टर्म वीजा दिया जाता है। इसे हर साल रीन्यू किया जाता है। इसकी मदद से शरणार्थी रोजगार, बैंकिंग और शिक्षा जैसी सुविधाएं हासिल करते हैं।