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...जब अंग्रेजों ने किसानों पर लगा दिए थे 143 टैक्स, बाबा रामचंद्र ने रामायण गाकर चलाया था अवध किसान आंदोलन

Sat, 12 Dec 2020 05:47 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

प्रसिद्ध इतिहासकार कपिल कुमार ने अमर उजाला को बताया कि अंग्रेजी शासन के बेतरतीब करों से जनता परेशान हो गई थी। उन्हें इससे मुक्ति दिलाने के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा से गौरीशंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी ने फरवरी 1918 में 'किसान सभा' का गठन किया...
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यमुना एक्सप्रेसवे पर किसान - फोटो : Amar Ujala (For Refernce Only)
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विस्तार
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इस देश में किसानों के सरकार से टकराने का इतिहास बहुत पुराना है। इतिहासकारों का दावा है कि अंग्रेजी सरकार ने कभी किसानों पर 143 तरह के कर लगा दिए थे। इन करों को वसूलने के लिए रखे गए जमींदार-तालुकदार घोषित करों से भी ज्यादा की वसूली कर रहे थे। उनके घर बच्चा पैदा होने, शादी-विवाह होने या किसी के मरने पर भी किसानों को उन्हें 'नजराना' पेश करना पड़ता था। इससे गरीब किसानों की कमर टूट गई थी।

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किसानों को इस दयनीय हालत से निकालने के लिए ही देश के नेताओं ने किसान आंदोलन की शुरुआत की जो देश के स्वतंत्रता आंदोलन को गांवों तक ले गया और अंततः अंग्रजों की देश से विदाई का कारण बना।


प्रसिद्ध इतिहासकार कपिल कुमार ने अमर उजाला को बताया कि अंग्रेजी शासन के बेतरतीब करों से जनता परेशान हो गई थी। उन्हें इससे मुक्ति दिलाने के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा से गौरीशंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी ने फरवरी 1918 में 'किसान सभा' का गठन किया। जून 1919 तक इसकी लगभग 450 से ज्यादा शाखाएं अवध प्रांत के अलग-अलग हिस्सों में बन गईं। किसान आंदोलन तेज होने लगा।
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स्वामी सहजानंद सरस्ती ने इसी किसान सभा की एक जनसभा में भाषण देते हुए कहा था कि भगवान की पूजा इंसान करते हैं, लेकिन इंसान को रोटी चाहिए। अगर किसान नहीं रहेंगे तो इंसानों को रोटी कौन देगा और अगर इंसान नहीं रहेंगे तो भगवान की पूजा कौन करेगा।

दिसंबर 1920 में किसान सभा में बाबा रामचंद्र का आगमन हुआ जो मूलरूप से महाराष्ट्र के रहने वाले थे, लेकिन उन्होंने अवध क्षेत्र को ही अपनी कर्मभूमि बना लिया था। बाबा रामचंद्र इतना ओजस्वी भाषण देते थे कि किसान उनसे प्रेरित होकर अंग्रेजों के कानूनों का उल्लंघन करने को सहज तैयार हो जाते थे।

यही समय था जब प्रथम विश्वयुद्ध के कारण अंग्रेजी सरकार भी आर्थिक तंगी का सामना कर रही थी। अपने खर्चों को पूरा करने के लिए उसने जनता पर तरह-तरह के कर लगा दिए थे। इससे जनता को परेशानी होने लगी। किसान सभा के कुछ नेताओं का कहना था कि उन्हें चुपचाप अंग्रेजी सरकार का साथ देना चाहिए और इस साथ के बदले अंग्रेजों से स्वतंत्रता की मांग करनी चाहिए।

जबकि बाबा रामचंद्र जैसे लोगों का कहना था कि यही सही समय है कि जब अंग्रेज कमजोर हैं। इस समय पूरी ताकत के साथ हमला कर अब अंग्रेजों को देश से भगा देना चाहिए। किसान सभा के नेताओं में मतभेद बढ़ने लगे और अंततः बाबा रामचंद्र ने अपना अलग संगठन 'अवध किसान आंदोलन' के नाम से बना लिया।

रामायण गाकर किया जागरूक

यह आंदोलन मूलतः बरेली, फैजाबाद और आसपास के इलाकों में फैलता जा रहा था। प्रतापगढ़ इस आंदोलन की धुरी बन गया था। बाबा रामचंद्र और उनके साथी रात के समय रामायण पाठ का आयोजन करते थे और जगह-जगह पर सत्यनारायण व्रतकथा का आयोजन कराते थे। किसान इसमें आकर यह शपथ लेते थे कि अगर टैक्स न दे पाने के कारण तालुकदार किसी किसान से जमीन वापस लेते हैं और नया कर लेकर उसे किसी दूसरे किसान को देते हैं तो वे ऐसे खेतों में काम नहीं करेंगे।

यह एक तरीका निकाला गया जिससे तालुकदारों, जमीदारों और अंग्रेजों का विरोध किया जा रहा था। यह आंदोलन लगातार लोकप्रिय होता चला गया। इन आंदोलनों में तालुकदारों, जमींदारों, ज्यादा दाम वसूलने वाले बनियों-व्यापारियों और अंग्रेजों का भरपूर विरोध हो रहा था।

हिंसा से बदनाम हुआ आंदोलन

अवध किसान सभा में लगातार किसानों के जुड़ते चले जाने से अंग्रेजी सरकार भी परेशान हो रही थी। वह इस आंदोलन के किसानों की धर-पकड़ करने लगी। उनके नेताओं की अन्य मामलों के बहाने जेलों में डालने लगी। लेकिन इसके बाद भी आंदोलन कमजोर नहीं पड़ रहा था। लेकिन इधर कुछ किसान अनियंत्रित होते जा रहे थे। तालुकदारों, जमीदारों और बनियों से परेशान किसान उनके गोदामों की लूटपाट भी करने लगे थे। लेकिन यह बड़ी गलती थी क्योंकि इस हिंसा के कारण अंग्रेजी सरकार को उनके ऊपर हिंसक कार्रवाई करने का अवसर मिलने लगा था।

6 जनवरी 1921 को फुर्सत गंज बाजार में ऐसा ही एक आंदोलन चल रहा था। कुछ किसान लूटपाट की कोशिश करने लगे थे। इसे रोकने के बहाने के नाम पर अंग्रेजी सरकार ने गोली चलाने का आदेश दे दिया जिससे अनेक किसान मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। इसी बीच अंग्रेजी सरकार ने टैक्स में सुधार का एक बड़ा कार्यक्रम भी पेश कर दिया जिससे किसानों का विरोध कुछ कम हो गया। कुछ बड़े नेताओं की गिरफ्तारी और अन्य किसानों के पीछे हट जाने के कारण यह आंदोलन खत्म हो गया।

नेहरू ने की थी तारीफ

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा की पुस्तक में बाबा रामचंद्र पर दो पृष्ठ लिखे हैं। उन्होंने उनकी जमकर प्रशंसा की है। अंग्रेजों ने जब उनकी गिरफ्तारी का अभियान चलाया था तब उन्हें छिपाकर जगह-जगह ले जाया गया था। वे पंडित नेहरू के प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) स्थित घर आनंद भवन में भी कुछ दिन छिपे थे। हालांकि, बाद में पंडित नेहरू ने बाबा रामचंद्र पर स्वार्थी होने का आरोप भी लगाया था। बाबा रामचंद्र ने इसके जवाब में पंडित नेहरू को लिखा था कि वे उनसे कुछ मांगते नहीं हैं। वे किसानों के लिए जीते हैं और उन्हीं के लिए सब कुछ करते हैं।

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