इस देश में किसानों के सरकार से टकराने का इतिहास बहुत पुराना है। इतिहासकारों का दावा है कि अंग्रेजी सरकार ने कभी किसानों पर 143 तरह के कर लगा दिए थे। इन करों को वसूलने के लिए रखे गए जमींदार-तालुकदार घोषित करों से भी ज्यादा की वसूली कर रहे थे। उनके घर बच्चा पैदा होने, शादी-विवाह होने या किसी के मरने पर भी किसानों को उन्हें 'नजराना' पेश करना पड़ता था। इससे गरीब किसानों की कमर टूट गई थी।
यह आंदोलन मूलतः बरेली, फैजाबाद और आसपास के इलाकों में फैलता जा रहा था। प्रतापगढ़ इस आंदोलन की धुरी बन गया था। बाबा रामचंद्र और उनके साथी रात के समय रामायण पाठ का आयोजन करते थे और जगह-जगह पर सत्यनारायण व्रतकथा का आयोजन कराते थे। किसान इसमें आकर यह शपथ लेते थे कि अगर टैक्स न दे पाने के कारण तालुकदार किसी किसान से जमीन वापस लेते हैं और नया कर लेकर उसे किसी दूसरे किसान को देते हैं तो वे ऐसे खेतों में काम नहीं करेंगे।
यह एक तरीका निकाला गया जिससे तालुकदारों, जमीदारों और अंग्रेजों का विरोध किया जा रहा था। यह आंदोलन लगातार लोकप्रिय होता चला गया। इन आंदोलनों में तालुकदारों, जमींदारों, ज्यादा दाम वसूलने वाले बनियों-व्यापारियों और अंग्रेजों का भरपूर विरोध हो रहा था।
अवध किसान सभा में लगातार किसानों के जुड़ते चले जाने से अंग्रेजी सरकार भी परेशान हो रही थी। वह इस आंदोलन के किसानों की धर-पकड़ करने लगी। उनके नेताओं की अन्य मामलों के बहाने जेलों में डालने लगी। लेकिन इसके बाद भी आंदोलन कमजोर नहीं पड़ रहा था। लेकिन इधर कुछ किसान अनियंत्रित होते जा रहे थे। तालुकदारों, जमीदारों और बनियों से परेशान किसान उनके गोदामों की लूटपाट भी करने लगे थे। लेकिन यह बड़ी गलती थी क्योंकि इस हिंसा के कारण अंग्रेजी सरकार को उनके ऊपर हिंसक कार्रवाई करने का अवसर मिलने लगा था।
6 जनवरी 1921 को फुर्सत गंज बाजार में ऐसा ही एक आंदोलन चल रहा था। कुछ किसान लूटपाट की कोशिश करने लगे थे। इसे रोकने के बहाने के नाम पर अंग्रेजी सरकार ने गोली चलाने का आदेश दे दिया जिससे अनेक किसान मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। इसी बीच अंग्रेजी सरकार ने टैक्स में सुधार का एक बड़ा कार्यक्रम भी पेश कर दिया जिससे किसानों का विरोध कुछ कम हो गया। कुछ बड़े नेताओं की गिरफ्तारी और अन्य किसानों के पीछे हट जाने के कारण यह आंदोलन खत्म हो गया।
प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा की पुस्तक में बाबा रामचंद्र पर दो पृष्ठ लिखे हैं। उन्होंने उनकी जमकर प्रशंसा की है। अंग्रेजों ने जब उनकी गिरफ्तारी का अभियान चलाया था तब उन्हें छिपाकर जगह-जगह ले जाया गया था। वे पंडित नेहरू के प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) स्थित घर आनंद भवन में भी कुछ दिन छिपे थे। हालांकि, बाद में पंडित नेहरू ने बाबा रामचंद्र पर स्वार्थी होने का आरोप भी लगाया था। बाबा रामचंद्र ने इसके जवाब में पंडित नेहरू को लिखा था कि वे उनसे कुछ मांगते नहीं हैं। वे किसानों के लिए जीते हैं और उन्हीं के लिए सब कुछ करते हैं।