साल 1971 की गर्मियों में पूर्वी पाकिस्तान से रोज-रोज बढ़ती शरणार्थियों की संख्या के कारण प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी काफी परेशान चल रही थीं। एक दिन उन्होंने सेनाध्यक्ष जनरल एफएमजे मानकेशा को अपने पास बुलाया और पूछा की, 'सैम भारत की पूर्वी सीमा पर हालात लगातार बिगड़ रहे हैं क्या तुम्हारी सेना वहां हस्तक्षेप करने के लिए तैयार है। (हस्तक्षेप से इंदिरा का आशय पूर्वी पाकिस्तान पर सैन्य कार्रवाई से था) बेलौस जवाब देने वाले मानेकशा ने तुरंत कहा, नहीं... अभी नहीं।
इंदिरा ने युद्ध के लिए जोर दिया तो सैम ने सीधा सवाल पूछ लिया, 'मैम क्या आप जंग हारना चाहती हैं।' इंदिरा को इस जवाब की उम्मीद नहीं थी। लेकिन सैम ने समझाया कि अभी हमारी सेना जंग के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है आप हमें तैयारी के लिए छह महीने का समय दीजिए... जीत मैं आपको दूंगा। सैम ने जितनी विश्वसनीयता से अपनी बात को रखा इंदिरा उससे पूरी तरह मुतमुइन हो गईं।
असल में ये सारा मामला जुड़ा था वर्तमान बांग्लादेश और उस समय के पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के सामूहिक दमन से, जिसने देश के पूर्वी हिस्से में इंसाानी जुल्मों सितम की इंतहा पार कर दी थी। मार्च के महीने से लेफ्टिनेंट जनरल टीका खान के नेतृत्व में शुरू हुआ पाकिस्तानी सेना का यह रक्तरंजित अभियान पाकिस्तान के विभाजन पर जाकर ही शांत हुआ।
पाक सेना के खिलाफ उस समय शेख मुजीबुर्रहमान की मुक्ति वाहिनी ने विरोध का बिगुल फूंक रखा था। इसके चलते बांग्लादेश की सड़कों पर रोज कत्लेआम हो रहा था। इस खूनी संघर्ष के कारण बांग्लादेश से हजारों की संख्या में रोज पलायन कर भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में प्रवेश कर रहे थे।
छह महीनों में ही भारत में 10 लाख बांग्लादेशी प्रवेश कर चुके थे। इसके अलावा भारत की पूर्वी सीमा पर भी अस्थिरता बनी हुई थी, इसी को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी परेशान चल रही थीं। काफी सोच विचार कर उन्होंने युद्ध का फैसला किया। जिसको लेकर उन्होंने तत्कालीन सेनाध्यक्ष मानेकशा से विचार विमर्श किया था।