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रिंग के अंदर और बाहर, दोनों किरदारों में महान, जब मैं मिला अली से

Thu, 09 Jun 2016 10:58 AM IST
मंसूरुद्दीन फ़रीदी/ अमर उजाला डॉट कॉम के लिए
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1990 में कोलकाता दौरे पर आए थे मोहम्मद अली
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दुनिया में ऐसे बहुत काम लोग होते हैं, जो खुद को सब से महान कहें और दुनिया सर झुका कर मान ले। ऐसा ऐलान दुनिया को ललकारने और ज़माने को दुश्मन बनाने जैसा होता है। मगर दुनिया में एक ऐसा शख्स भी था, जिसने यह ऐलान एक बार नहीं बार-बार किया। डंके की चोट पर किया,चीख-चीखकर किया, सीना तानकर किया, दुनिया की आँखों में आँखें डालकर किया। और दुनिया ने हर बार सर झुकाकर उस की बात को माना क्योंकि दुनिया जानती थी की वाकई अली जैसा कोई नहीं।
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1990 में, जब बॉक्सिंग के लीजेंड को मैंने कोलकाता में अपनी आँखों से देखा, सामने खड़ा देखा और मुस्कुराते हुए देखा तो अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। बिल्कुल सहज बिल्कुल शांत, बिल्कुल पुरसुकून, न कोई घमंड, न कोई अकड़, ना कोई नखरा। पहली बार ही लग गया था कि अली वाकई रिंग के अंदर और रिंग के बहार दोनों किरदारों में महान हैं। सलाम किया तो जवाब मिला। हाथ बढ़ाया तो हाथ थाम लिया, ऐसा लगा कि गोया मेरा हाथ किसी देव के हाथ में हो, मेरा फोटोग्राफर अपना काम कर रहा था। हद तो यह थी के अली के सुइट में, उनके बेडरूम में भी लोग जा रहे थे, मगर उनके माथे  पर कोई बल नहीं आये थे।



हम सबसे पहले अली को होटल ताज बंगाल से नमाज़ के लिए कोलोटोला मस्जिद ले गए। मुझे याद है, वह एक ऐसी कार में सफर कर रहे थे जिस में एसी भी नहीं था। ना कोई एस्कॉर्ट ना कोई सिक्योरिटी। जब हमारी कार रेस कोर्स  रोड पर थी, तो सड़क के किनारे बच्चों को देखकर अली ने कार रुकवाई। कार से उतरे और आहिस्ता-आहिस्ता फुटपाथ पर खेल रहे बच्चों के पास चले गए। उस वक़्त तक अली को बोलने में ज्यादा प्रॉब्लम थी ना कि चलने में। पर्किंसन की बीमारी को उस वक्त सिर्फ चार साल ही गुज़रे थे। कुछ देर में फिर कार चल पड़ी, जब हम मस्जिद के सामने पहुंचे, तो उस वक़्त तक किसी को इस बात का एहसास नहीं था कि अली उन नमाज़ियों के बीच हैं। वे जहाँ जगह मिली वहीँ पर बैठ गए, नमाज़ पढ़कर दुआ मांगते रहे, उस वक़्त तक मस्जिद में अली की झलक पाने के लिए अफरातफरी मच चुकी थी। इसलिए नमाज़ियों की भीड़ से निकल कर दोबारा होटल का लौटे।
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सबसे बड़ी बात थी की अली ने कभी भी मिलने वालों की भीड़ से परेशानी ज़ाहिर नहीं की। वह खासतौर से बच्चों से बहुत खुश होते नज़र आये। उन से सवाल करना और जवाब का इंतज़ार करना बहुत मुश्किल था। वह सुनने के बाद अगर मुमकिन होता तो बहुत धीमी आवाज़ मैं टूटे हुए शब्दों में जवाब देने की कोशिश करते थे। मुझे याद नहीं कि अली ने किसी सवाल का पूरा जवाब दिया हो। उनकी मुस्कराहट ही सब के लिए काफी थी। अली ने हर बात का बहुत आहिस्ता आवाज़ में जवाब देने की कोशिश की, मगर बहुत कामयाब नहीं हुए। बहुत सी बातें इशारे में की थीं। उन्होंने अपना एक मैजिक दिखाया। वह अपने रूम के एक कोने में खड़े हो गए और खुद को ज़मीन से कुछ सेंटीमीटर ऊपर उठाकर सब को दांग कर दिया।

असर की नमाज़ के बाद अली ने क़ुरान शरीफ की तिलावत की, उस वक़्त भी हम लोग उन के रूम में थे। उन्होंने कभी किसी की मौजूदगी पर ना एतेराज़ किया ना नाखुशी ज़ाहिर की। जो आया उसने अली के साथ फोटो की तमन्ना पूरी की और ऑटोग्राफ लिए। उनमें राजनेता थे, खिलाड़ी थे, पत्रकार थे और समाज सेवक थे , दो दिनों तक होटल ताज बंगाल में एक मेला सा लगा रहा।

अली की हस्ती ऐसी थी की जिस ने देखा वह देखता रह गया। उन की खाकसारी बता रही थी की वह कितना बुलंद इंसान है। एक ऐसा शख्स जिसने अमेरिका में क्रांति पैदा कर दी। जिस ने अमेरिका में कालों के अधिकारों के लिए बड़ी जंग लड़ी ,जिसने धार्मिक आधार पर वियतनाम युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया था। जिसने रिंग के अंदर आसान लड़ाइयां लड़ी थीं, लेकिन रिंग के बाहर बड़ी और खतरनाक लड़ाइयां लड़ी थीं। जीत सच की होती है, इसलिए अली भी जीते। उन्हें ओलंपिक की मशाल रोशन करने की दावत दी गयी और फिर 2005 में देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान '' फ्रीडों ''दिया गया। आज वही देश उनको सलाम कर रहा है, जिसने उन्हें जेल में डालने का आदेश दिया था। उस देश का राष्ट्रपति कह रहा है कि अली ने हमेशा हक़ की लड़ाई लड़ी है। वह हमेशा सही थे। यही है अली के जीवन की सबसे बड़ी कमाई।
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