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PM Modi Russia Visit: शक्ति संतुलन साधने के लिए रूस से क्या लेकर लौटेंगे प्रधानमंत्री मोदी? जानें सब कुछ

सार

भारत के पास अभी सबसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों में बहुउद्देश्यीय राफेल है। राफेल चौथी और पांचवी पीढ़ी के बीच का लड़ाकू विमान है। इसके बाद सुखोई-30एमके आई है। सुखोई-30 एमकेआई चौथी पीढ़ी के आस-पास का है। बताते चलें कि रूस और भारत से काफी पहले मिलकर पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को विकसित करने और इसकी तकनीक को साझा करने पर सहमति बना रखी है।
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पीएम मोदी और व्लादिमीर पुतिन। - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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भारत की बड़ी रक्षा जरूरतों में बस दो हैं, पहली भारतीय वायु सेना में पांचवी पीढ़ी का लड़ाकू विमान और दूसरी एस-400 ट्रायंफ जैसी प्रतिरक्षी मिसाइल प्रणाली की कम से कम 5 और यूनिट। रक्षा मामलों के विशेषज्ञ पूर्व एयर वाइस मार्शल नरेन्द्र बहादुर सिंह कहते हैं कि इनके सैन्य बेड़े में शामिल होने के बाद भारत की बड़ी सैन्य चिंता दूर हो जाएगी। दरअसल, भारत के पड़ोसी देश चीन के सैन्य बेड़े में जे-20 पांचवी पीढ़ी का अत्याधुनिक लड़ाकू विमान उड़ान भर रहा है। पाकिस्तान ने अपने सैन्य बेड़े के लिए इसे लेने की घोषणा दी है। क्षेत्रीय सामरिक सैन्य संतुलन के लिहाज से भारत को इस श्रेणी के लड़ाकू विमान(सुखोई-57) की जरूरत है। देखना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस मास्को यात्रा में इस पर कौन सा भरोसा मिलता है।  

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भारत के पास अभी सबसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों में बहुउद्देश्यीय राफेल है। राफेल चौथी और पांचवी पीढ़ी के बीच का लड़ाकू विमान है। इसके बाद सुखोई-30एमके आई है। सुखोई-30 एमकेआई चौथी पीढ़ी के आस-पास का है। बताते चलें कि रूस और भारत से काफी पहले मिलकर पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को विकसित करने और इसकी तकनीक को साझा करने पर सहमति बना रखी है।

केवल तीन देशों के पास हैं पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान
अमेरिका की लड़ाकू विमान निर्माता कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने एफ-35 लाइटनिंग को विकसित कर रखा है। यह बहुउद्देश्यी, रेडार की पकड़ में न आने वाला, अद्वितीय मैनुअरिंग क्षमता से युक्त फाइटर जेट है। 2010 में ही संवाददाता ने मारिएट के आसमान में इसे उड़ान भरते देखा है। इसके अलावा का एफ-22 रैप्टर है। इन दोनों लड़ाकू विमानों को अमेरिका ने अपनी वायुसेना में शामिल किया है। ये ट्विन इंजन फाइटर जेट हैं। इसके अलावा एकल इंजन के 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट को विकसित करने में अमेरिकी रक्षा वैज्ञानिक लगे हैं।
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चीन की वायु सेना में चेंगदू जे-20 उड़ान भर रहा है। जे-20 भी पांचवीं पीढ़ी का ट्विन इंजन मल्टीरोल फाइटरजेट है। अत्याधुनिक सुविधाओं और मारक क्षमताओं से लैस है। चीन के रक्षा वैज्ञानिक भी एकल इंजन के फाइटर जेट को विकसित करने पर काम कर रहे हैं। पाकिस्तान ने हाल में अपनी वायुसेना में चीन के पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को शामिल करने की घोषणा है।

अमेरिका के समानांतर ही रूस की वायुसेना में भी सुखोई-57 फेलॉन पर नाटो देशों की नजर है। हाल में युक्रेन ने रूस के हैंगर के पास ड्रोन हमले में सुखोई-57 को नष्ट करने का दावा किया था। माना जाता है कि सुखोई-57 फेलॉन दुनिया अत्याधुनिक, बहुउद्देश्यीय, लजवाब मैनुअरिंग क्षमताओं से युक्त घातक लड़ाकू विमान है। रूस इसके अगले संस्करण के पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर भी काम कर रहा है और एकल इंजन के फाइटर जेट को विकसित करने की कोशिश जारी है।    

क्या है पांचवी पीढ़ी का लड़ाकू विमान?
दुश्मन को चकमा देना, रेडार और सर्विलांस की पकड़ में न आना, दुश्मन के ठिकानों की सटीकता से पहचान और पलक झपकने से पहले ही हाई स्पीड मानुअरिंग के साथ ओझल हो जाना। ऐसे फाइटर जेट जिसमें आक्रमण के साथ-साथ बचाव की क्षमता, देर तक उड़ान भरने, हवा में ईधन लेने में सक्षम हो और एक फाइटर ही जेट से जमीन, हवा, जल तीनों क्षेत्र में युद्ध की डिजाइन और मांग को काफी हद तक पूरा किया जा सके। अपने अत्याधुनिक एलटीआर रेडार प्रणाली, एवियानिक्स, हेड माऊंटेड कॉकपिड, पायलट फ्रेंडली आपरेशन के सहारे हर संभावित लक्ष्य को साधने में संभव होते हैं।

भारत को क्यों चाहिए पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान और एस-400 ट्रायंफ की कुछ और इकाई
पाकिस्तान, चीन से मिल रही चुनौतियों और क्षेत्रीय सामरिक संतुलन के लिए एस-400 ट्रायंफ और सुखोई-57 फेलॉन जैसे लड़ाकू विमान जरूरी हैं। एस-400 मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली है और यह दुश्मान के मिसाइल, राकेट, फाइटर जेट समेत तमाम घातक फ्लाइंग आब्जेक्ट हवा में दूर स्वत: पहचान कर काफी दूर(400-600 किमी) ही मार गिराने में सक्षम है। आंतरिक और वाह्य दोनों ही वायुमंडल से आने वाले खतरे को नेस्तनाबूत कर देती है। भारत के पास अभी इसकी तीन ईकाई है। सौदे के मुताबिक दो ईकाई रूस से आनी है और भारत इसकी कुछ और यूनिट चाहता है। इसे इस्राइल की मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली आयरन डोम और अमेरिका के पैट्रियट और इसके उन्नत संस्करणों की तरह काफी बेहतर माना जाता है। अभी तक भारत के पास कोई बहुत उन्नत और इसके आस-पास की मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली नहीं है। प्रतिरक्षा प्रमाली में भारत के पास अभी आकाश मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली ही है और इसकी क्षमता तुलना में सीमित है।  

एस-400 की तरह ही भारत को पांचवीं पीढ़ी का उन्नत लड़ाकू विमान भी चाहिए। ताकि चीन और पाकिस्तान की सैन्य ताकत को देखते हुए सामरिक सैन्य संतुलन बना रहे। भारतीय वायुसेना को दुनिया की मारक, घातक वायुसेनाओं में गिना जाता है। ऐसे सुखोई-57 लड़ाकू विमान के बेड़े में शामिल होने के बाद दुश्मन को भी किसी युद्ध जैसी संभावना के लिए 100 बार सोचना पड़ेगा।

कहां रुकी है एस-400 है पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट की बात?
भारत और रूस के बीच में एक दशक से पहले ही संयुक्त प्रयास से पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को विकसित करने पर सहमति बनी थी। इसे हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और रूस की विमान निर्माता कंपनी के सहयोग से तैयार किए जाने पर सैद्धांतिक सहमति बनी थी। लेकिन अभी भारत को कम से कम दो स्क्वाड्रान(एक स्क्वाड्रान में 16 फाइटर जेट और 2 प्रशिक्षण फाइटर जेट) चाहिए। रूस की तरफ से इसको लेकर प्रस्ताव आए थे लेकिन अभी दोनों देशों के बीच में इस पर कोई सहमति या सौदा नहीं हुआ है।

भारत ने रूस के साथ 2018 में एस-400 वायुरक्षा प्रणाली की पांच यूनिट लेने के लिए 5.4 अरब डालर का करार किया था। अक्टूबर 2023 तक रूस ने भारत को इसकी तीन प्रणालियां दे दी हैं। अभी दो प्रणालियों को रूस से प्राप्त किया जाना बाकी है। भारत चाहता है कि दोनों यूनिट उसे यथाशीघ्र मिल जाए। माना जा रहा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण इसकी आपूर्ति में देरी हो रही है।

प्रधानमंत्री मंत्री के मास्को दौरे से क्या है उम्मीद?
उम्मीद की जा रही है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रूस के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता में मुद्दा उठाएंगे। दोनों देशों के बीच में इस मामले में सहमति बनने के भी पूरे आसार हैं। हालांकि भारतीय रक्षा वैज्ञानिक पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास और एस-400 जैसी प्रतिरक्षी मिसाइल प्रणाली को विकसित करने पर काम कर रहे हैं। बताते चलें कि चीन जैसे देश नहीं चाहते कि भारत को रूस से पांच यूनिट से अधिक एस-400 मिसाइल प्रतिरक्षा प्रमाली और पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान मिलें। भारत के पास वर्तमान में अपनी नि दोनों रक्षा जरूरत को पूरा करने के लिए दो ही विकल्प हैं। एक रूस और दूसरा अमेरिका। अमेरिका की रक्षा मशीन और उत्पाद रूस की तुलना में तीन से चार गुणा तक मंहगी पड़ती है। दूसरे सोर्स कोड जैसे तमाम गतिरोध हैं। ऐसे में भारत के लिए सबसे उपयुक्त, विश्वसनीय सामरिक साझीदार सहयोगी देश रूस ही है।

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