यहां महत्वपूर्ण हो जाता है यह जानना भी कि आचार संहिता लागू होते ही प्रदेश का मुख्यमंत्री या मंत्री जनता के लिए कोई घोषणा नहीं कर सकते हैं। इस दौरान राज्य में न तो शिलान्यास किया जाता है न लोकार्पण और न ही भूमिपूजन।
इस दौरान सरकारी खर्च से ऐसा आयोजन नहीं किया जाता है जिससे किसी भी दल विशेष को लाभ पहुंचता हो। राजनीतिक दलों के आचरण और क्रियाकलापों पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग पर्यवेक्षक नियुक्त करता है।
वर्ष 2000 में केंद्रीय सरकार और चुनाव समिति के बीच आचार संहिता को लेकर काफी बहस हुई। केंद्र सरकार चुनाव की तारीख की घोषणा होते ही आचार संहिता लागू होने के चुनाव समिति के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी गयी।
सरकार का कहना था की औपचारिक अधिसूचना के बाद ही आचार संहिता लागू की जाये। चुनाव समिति ने मामले को सुलझाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों को एकत्रित किया और बाद में भाजपा समेत देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने आचार संहिता का समर्थन किया और तभी से चुनाव की तारीख घोषित किए जाने के साथ ही देश और राज्य में आचार संहिता लागू कर दी जाती है।