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आईटीओ से लाल किले तक क्या हुआ - परीक्षित निर्भय की आंखों देखी

Tue, 26 Jan 2021 08:36 PM IST
सुरेंद्र जोशी परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

आखिर वहीं हुआ जैसी आशंका थी, गणतंत्र दिवस पर किसानों की ट्रैक्टर रैली ने राजधानी की सड़कों पर शर्मनाक दृश्य पैदा किए। शांति व्यवस्था बनाए रखने के वादे से शुरू हुई ट्रैक्टर रैली देखते-देखते उपद्रव व अराजकता में बदल गई। बैरिकेड तोड़ कर ट्रैक्टर रैली दिल्ली के अंदरुनी इलाकों में पहुंच गई।पहले आईटीओ यानी दिल्ली पुलिस के मुख्यालय के सामने डेरा जमाया गया, यहां उपद्रव व बवाल की शुरुआत हुई। इसके बाद कुछ वाहनों में सवार लोग ऐतिहासिक लालकिले की प्राचीर पर पहुंच गए। वहां भी बवाल हुआ। जानिए अमर उजाला रिपोर्टर  की आईटीओ से लाल किले तक आंखों देखी: 
 
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आईटीओ पर प्रदर्शन में टूटे वाहनों के शीशे - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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आईटीओ तक ट्रैक्टर रैली के साथ किसान बड़ी आसानी से पहुंच चुके थे, यहां से बाईं और लाल किला और दाईं ओर पूरी लुटियन दिल्ली है। ये ही दो क्षेत्र थे जिन पर कब्जा करने का उद्देश्य आंदोलनकारियों का झलक रहा था। इसलिए मंगलवार को यहीं सबसे ज्यादा बवाल हुआ।

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तीन बसों को फोड़ा, लोहे के पोल उखाड़ दिए
दरअसल, प्रदर्शनकारी लुटियन दिल्ली में प्रवेश के लिए बेताब थे। इसके लिए वे इस कदर उग्र हुए कि तीन बसों को क्षतिग्रस्त कर दिया।बैरिकेड तोड़ डाले। सड़कों पर लगे लोहे के पोल को निकालकर हाथों में लिया और पुलिस के साथ झड़प होने लगी। 

25 बसें खड़ी कर लुटियन को बचाया
पुलिस ने आंदोलनकारियों को रोकने के लिए इंतजाम किए थे। तिलक ब्रिज और सुप्रीम कोर्ट के बीच 25 डीटीसी बसें एक के बाद एक सड़क के बीचोंबीच खड़ी की गई थीं। ताकि ट्रैक्टर-ट्रालियां डीटीसी की इतनी बसों को पार नहीं कर सकें। यहां पुलिस, रैपिड एक्शन, बीएसएफ के साथ अन्य कंपनियों के जवान भी थे। पुलिस की इसी तैयारी को देख यह पता चल रहा था कि किसानों के लुटियन दिल्ली पर कब्जे को लेकर इनपुट्स पहले से ही थे। 
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पुलिस, बीएसएफ व रैपिड एक्शन फोर्स तक थे तैनात
शायद इसीलिए पुलिस का पूरा ध्यान आईटीओ और तिलक ब्रिज के 50 मीटर की दूरी पर ही था। लाल किला तक आने—जाने के लिए कोई रुकावट देखने को नहीं मिली, लेकिन लुटियन तक जाने के लिए दिल्ली पुलिस की थ्री लेयर थी। पहले रैपिड एक्शन फोर्स, बीच में दिल्ली पुलिस और आखिरी में बीएसएफ के जवान, जो हथियारों के साथ तैनात थे। इससे साफ पता चल रहा था कि पुलिस पहले हल्का बल प्रयोग और फिर आंसू गैस के जरिए प्रदर्शनकारियों को रोकती और अगर फिर भी स्थिति नियंत्रण में नहीं आती तो आखिर में बीएसएफ के जवान गोली चलाने के लिए भी तैयार थे। 

कई घंटे तक रहा आंसू गैस का असर
लुटियन दिल्ली तक नहीं पहुंचने का गुस्सा उग्र किसानों ने डीटीसी की बसों और रास्ते पर लगे बैरिकेड्स पर उतारा। उन्हें रोकने के लिए कई बार आंसू के गोले भी छोड़े गए। हालात इस कदर थे कि कई घंटों तक यहां की हवा में आंसू गैस का असर साफ महसूस किया जा रहा था। 

तलवार, डंडों व रॉड से लैस थे युवा
यहां एक बात और, उग्र प्रदर्शन में सबसे ज्यादा युवा थे, जबकि अधेड़ आयु वाले सभी अपने अपने ट्रैक्टरों पर सवार थे। तलवार, डंडा, लोहे की रॉड इत्यादि से लैस इन युवाओं में 18 साल के भी किशोर थे और 25 से 30 वर्ष के युवा भी। इनका साथ देने के लिए सराये काले खां और डीडीयू की ओर से भी ट्रैक्टर आ रहे थे और इसी बीच डीडीयू मार्ग पर एक ट्रैक्टर के पलटने से प्रदर्शनकारी की मौत भी हुई। 

पहले से ही दो टुकड़ी पर था फोकस
इस प्रदर्शन को देख एक बात साफ थी कि दिल्ली आने से पहले ही किसानों की दो टुकड़ी पर पूरा फोकस था। एक जो आईटीओ के बाद लाल किला जाएगी और दूसरी वह जो लुटियन की ओर आगे बढ़ेगी। लाल किला वाली टुकड़ी का साथ देने के लिए कश्मीरी गेट से पहुंचने वाले किसानों ने दिया। जबकि लुटियन जाने वालों के लिए साथ देने सराये कालेखां से ट्रैक्टर वहां पहुंचे थे। 

चंद मिनट की देरी नहीं होती तो रूक जातीं झांकियां
किसानों के आईटीओ पहुंचने से पहले गणतंत्र दिवस की झांकियां वहां से गुजर चुकी थीं। करीब 10 से 20 मिनट का अंतराल ही था। अगर किसान इन अंतराल से पहले वहां होते तो शायद गणतंत्र दिवस की झांकियां तिलक मार्ग से लाल किला तक नहीं पहुंच पातीं जो कि पुलिस के लिए एक अलग ही चुनौती था। 

सीएए-एनआरसी का मुद्दा भी उठा 
ट्रैक्टर परेड और उग्र प्रदर्शन के बीच एक और घटना देखने को मिली, जब प्रदर्शनकारी आईटीओ से लाल किला की ओर बढ़ने लगे तो पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में सीएए और एनआरसी को लेकर भी मोदी सरकार के खिलाफ स्थानीय लोगों की नारेबाजी होने लगी। दरियागंज पुलिस थाना से चंद मीटर दूर चौराहे पर ही इन लोगों की सड़क के दोनों छोर पर भीड़ थी। यहां से गुजर रही ट्रैक्टर परेड के साथ यह नारेबाजी कर रहे थे। यह दृश्य काफी समय तक देखने को मिले। 

झंडा फहराने से रोकने पर सात जवान जख्मी
लाल किला पहुंचने के बाद प्रदर्शनकारियों की अगली योजना थी झंडा फहराना। यहां मौजूद पुलिस जवानों ने ऐसा करने से रोका तो यहां भी उग्र माहौल होने लगा। देखते ही देखते पुलिस के करीब आठ से नौ जवानों को चारों ओर से घेर लिया गया और उन पर जब हमला हुआ तो सात जवान चोटिल हुए। इनमें से एक सिपाही के हाथ तो एक के सिर पर गंभीर चोटें आई हैं। कम सुरक्षा बल आंदोलनकारियों की फौज पर हल्के पड़े और एक-एक कर छह झंडे लाल किले पर फहराए दिए गए। 

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