पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्देश पारित किए। कोर्ट ने डेडलाइन बढ़ाने के साथ-साथ सरकार और डीजीपी से जवाब भी मांगा। अदालत ने कहा कि एसआईआर में लगे 8500 से अधिक अफसर जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) को रिपोर्ट करें। जानिए कोर्ट ने और क्या बातें कहीं?
पश्चिम बंगाल में इस साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करा रहा है। मतदाता सूची से जुड़ा यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। कोर्ट ने आज इस मामले में अहम दिशा-निर्देश दिए। चीफ जस्टिस ने एसआईआर की समयसीमा बढ़ाने का भी निर्देश दिया। सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (SIR) की डेडलाइन एक सप्ताह और बढ़ाई जा रही है।
बंगाल के डीजीपी को हलफनामा दायर करने का निर्देश
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि कुछ बदमाशों / असामाजिक तत्वों ने अपने नोटिस जला डाले। इस आरोप पर कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ और बातों पर भी जोर दिया।
कोर्ट की टिप्पणियों पर बिंदुवार एक नजर:
राज्य सरकार ने 8,500 अधिकारियों की व्यवस्था की
कोर्ट ने इस बात का संज्ञान लिया कि मैनपावर की कमी के कारण चुनाव आयोग को माइक्रो-ऑब्जर्वर्स लगाने पड़े थे। इस पर वकील श्याम दीवान ने कहा, राज्य सरकार ने 8,500 अधिकारियों की व्यवस्था कर ली है। इस पर सीजेआई ने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या आपको इन अधिकारियों की सूची मिल गई है? आयोग के वकील ने कहा कि अभी तक कोई नाम नहीं मिला है।
बंगाल सरकार ने अधिकारियों का ब्योरा दिया
पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से पूर्व मुख्य सचिव और वर्तमान प्रधान सचिव मनोज पंत भी कोर्ट में मौजूद रहे। सीजेआई के सवाल पर पंत ने कहा कि 292 ईआरओ (ग्रुप-ए, एसडीएम रैंक) के नाम भेजे गए हैं। कुछ आईएएस भी हैं। कुल 8,525 सहायक ईआरओ हैं। अधिकारियों की सूची में 65 प्रतिशत ग्रुप-बी, 10-12 प्रतिशत ग्रुप-सी और बाकी ग्रुप-ए के अधिकारी हैं। सीजेआई ने आयोग से कहा कि वे एईआरओ बदलने पर विचार करें।
पश्चिम बंगाल सरकार ने चुनाव आयोग को ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची सौंपी
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से कहा कि आयोग ने कभी ग्रुप-बी अधिकारियों की मांग नहीं की थी। यह सुझाव कोर्ट से आया था, इसलिए विवरण जुटाने में समय लगा। सिंघवी ने कहा कि ईमेल भेज दिया गया है।
निर्वाचन आयोग के वकील ने क्या दलीलें दीं?
सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, अदालत के फैसले से यह संदेश जाना चाहिए कि भारत का संविधान सभी राज्यों पर लागू होता है। निर्वाचन आयोग ने एक हफ्ते पहले ही विस्तृत हलफनामा फाइल किया है। इसमें बहुत चिंताजनक बातें है। एक सांविधानिक संस्था शीर्ष कोर्ट को कुछ बताना चाहती है।
ये भी पढ़ें:- Supreme Court: 'SIR मामले में ममता बनर्जी की व्यक्तिगत पेशी कानूनी रूप से अनुचित', शीर्ष कोर्ट में याचिका दायर
सीएम की याचिका में क्या-क्या?
गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने अपनी याचिका में विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाया है। उन्होंने चुनाव आयोग पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया और कहा कि इस प्रक्रिया में समाज के कमजोर वर्गों के लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान किसी भी मतदाता का नाम न हटाया जाए, खासकर उन लोगों के जो तार्किक विसंगतियां श्रेणी में हैं।
वहीं पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था और मामले की अगली सुनवाई सोमवार के लिए निर्धारित की थी। सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने कहा था कि स्थानीय बोलियों के कारण नामों की वर्तनी में अंतर पूरे देश में होता है और इसे मतदाता को बाहर करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
ये भी पढ़ें:- SC में बोलीं ममता: 'व्हाट्सएप आयोग जैसा है चुनाव आयोग, सिर्फ नाम काटने के लिए हो रहा SIR, निशाने पर बंगाल'
ममता बनर्जी ने क्या कहा था?
गौरतलब है कि सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने कहा कि शादी के बाद नाम बदलने वाली महिलाएं और जिन लोगों ने अपने निवास स्थान बदले हैं, वे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल को लक्षित किया जा रहा है और असम जैसे अन्य राज्यों में ऐसी मतदाता संशोधन प्रक्रिया नहीं चल रही है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को बार-बार शिकायतें भेजी गईं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आश्वासन दिया कि कोई भी वास्तविक मतदाता अपना अधिकार नहीं खोएगा और व्यावहारिक समाधान निकाला जाएगा।