पश्चिम बंगाल के 75 वर्षों के राजनीतिक इतिहास में 2026 का विधानसभा चुनाव एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ है। आजादी के बाद दो दशक तक कांग्रेस का दबदबा रहा, जिसके बाद 34 वर्षों तक वाम मोर्चे का अभेद्य किला रहा। 2011 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के साथ इस किले को ढहाया, लेकिन अब 2026 में भ्रष्टाचार, शिक्षक भर्ती घोटाला और संदेशखाली जैसे मुद्दों के कारण उपजे असंतोष ने भाजपा के लिए सत्ता के द्वार खोल दिए हैं।
बंगाल की राजनीति ने 75 वर्षों में कई बड़े राजनीतिक बदलाव देखे। मगर, 2026 का विधानसभा चुनाव सबसे निर्णायक सत्ता परिवर्तन के रूप में दर्ज हो गया। आजादी बाद कांग्रेस का लंबा शासन, फिर 34 वर्षों तक वाम मोर्चा राज, उसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल का उभार। अब पहली बार भाजपा राज्य की सत्ता तक पहुंची है। भाजपा विधायक दल के नेता चुने गए शुभेंदु अधिकारी ने 2021 में नंदीग्राम में ममता को हराकर बड़े बदलाव का संकेत दिया था। जिस बंगाल में भाजपा की नींव जनसंघ के रूप में पड़ी, उस राज्य में 75 वर्षों के बाद वह अपने दम पर सरकार बनाने जा रही है।
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कांग्रेस का शुरुआती दबदबा :1952 में पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता हासिल की थी। दो दशक तक कांग्रेस का प्रभाव रहा। 1967 के बाद राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी और संयुक्त मोर्चा सरकारों का दौर शुरू हुआ।
34 साल तक अजेय वाम किला: 1977 में वाम मोर्चे ने सत्ता संभाली। ज्योति बसु और फिर बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाम मोर्चा लगातार सात चुनाव जीतकर 34 वर्षों तक सत्ता में रहा। यह दुनिया के सबसे लंबे लोकतांत्रिक वाम शासन में गिना जाता है। भूमि सुधार, पंचायत व्यवस्था और ग्रामीण संगठन को बड़ी उपलब्धियों में गिना गया, पर समय के साथ उद्योग बंद होने से रोजगार संकट, राजनीतिक हिंसा ने वाम आधार को कमजोर किया।
नंदीग्राम और सिंगूर से बदली राजनीति: 2007 के नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलन बंगाल की राजनीति के टर्निंग प्वाइंट साबित हुए। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन ने ममता बनर्जी को राज्यव्यापी जननेता के रूप में स्थापित किया। 2011 के चुनाव में तृणमूल ने 184 सीटें जीतकर वाम शासन का अंत किया। 2021 में भाजपा की चुनौती के बावजूद तृणमूल ने लगातार तीसरी बार सत्ता में आई।
साल 2016-2026 तक भाजपा का तेज उभार
भाजपा ने 2016 विधानसभा चुनाव में सिर्फ 3 सीटें जीती थीं। 2021 में पार्टी 77 सीटों तक पहुंची। सियासी हिंसा, शिक्षक भर्ती घोटाला, संदेशखाली विवाद, आरजी कर मेडिकल कॉलेज प्रकरण, भ्रष्टाचार के आरोपों को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। 2026 के चुनाव में यही असंतोष भाजपा के पक्ष में बड़े जनादेश में बदला।