पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीटों के लिए 27 मार्च से 29 अप्रैल के बीच आठ चरणों में चुनाव होंगे। भाजपा के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार अमित शाह पश्चिम बंगाल में दो सौ से ज्यादा सीटें जीतकर राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। अपने ज्यादातर चुनावी अनुमानों में अब तक खरे उतरे शाह ने इस लक्ष्य को पाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। बंगाल के प्रति उनकी गंभीरता का ही नतीजा माना जा रहा है कि पार्टी ने यहां से सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों तक को चुनावी मैदान में उतार दिया है।
पश्चिम बंगाल में भाजपा ने शुरुआत से ही मतुआ समुदाय के वोटरों को रिझाने की कोशिश शुरू कर दी थी। अमित शाह से लेकर बंगाल में भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार कैलाश विजयवर्गीय ने इस दौरान कई बार मतुआ समुदाय के लोगों के यहां भोजन करने का कार्यक्रम रख इस समुदाय को खुद से जोड़ने की ही कोशिश की थी। इसी प्रकार दलित और आदिवासी समूह के अन्य वर्गों को भी खुद से जोड़ने के लिए भाजपा ने लंबे समय से रणनीति के साथ काम किया है।
पार्टी के चुनाव प्रचार में लगे उत्तर प्रदेश के एक शीर्ष नेता के मुताबिक दलित वोट बैंक बंगाल में भाजपा के लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकता है, और यही वोटर उसे बंगाल की सत्ता दिला सकता है। पार्टी का अनुमान है कि उसकी अब तक की कोशिशों के कारण इस वर्ग के लगभग 60 फीसदी वोटर उसके साथ जुड़ चुके हैं। पश्चिम बंगाल की एससी/एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 84 सीटों में से अगर एक बड़ा हिस्सा उसके हाथ लग जाता है तो पार्टी का बंगाल मिशन कामयाब हो सकता है।
जानकारी के मुताबिक़ बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी ममता बनर्जी को यही रिपोर्ट दी थी कि इस बार सत्ता बरकरार रखने के लिए उन्हें सबसे कड़ी चुनौती इन 84 सीटों पर ही झेलनी पड़ सकती है। पीके ने ममता बनर्जी को इन सीटों को अपने साथ जोड़े रखने के लिए ‘बड़े दांव’ खेलने की सिफारिश की थी जो पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में दिखाई भी पड़ी।
प्रशांत किशोर की सलाह पर काम करते हुए ही ममता दीदी ने दलित-आदिवासी वोटरों को रिझाने के लिए प्रत्येक दलित/आदिवासी परिवार को 12 हजार रुपये प्रति वर्ष आर्थिक सहायता देने का बड़ा दांव खेला। टीएमसी का अनुमान है कि यह दांव उसे इन सीटों पर भारी जीत दिला सकता है।
अमित शाह की टीम इस वर्ग के वोटरों में सेंधमारी के लिए सिर्फ इनके घर खाना खाने की प्रतीकात्मक लड़ाई ही नहीं लड़ रही है, बल्कि ममता दीदी के चुनावी वायदों की काट भी खोज रही है। भाजपा के ‘सोनार बांग्ला संकल्प पत्र’ में इस वर्ग के लिए की गई घोषणाएं ममता दीदी की काट खोजने के प्रयास के लिए ही लाई गई हैं।
सूत्रों के मुताबिक़ ममता बनर्जी के इस चुनावी तीर से भाजपा को अपना सपना बिखरने तक का भय सताने लगा था। यही कारण है कि पार्टी ने अंतिम क्षणों में राज्य की 49 फीसदी महिला वोटरों को रिझाने के लिए उसने महिलाओं के लिए नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण, केजी से पीजी (शुरुआती शिक्षा से लेकर परास्नातक तक) तक की शिक्षा मुफ्त करने और उनकी बसों में यात्रा को पूरी तरह मुफ्त करने का बड़ा लोकलुभावन दांव खेला है, जबकि इसी समय चल रहे अन्य चार चुनावी राज्यों या भाजपा शासित किसी भी राज्य में पार्टी ने इस तरह का कोई दांव नहीं खेला है।
इसके आलावा भाजपा ने पहली कैबिनेट मीटिंग में ही सीएए कानून लागू करने, प्रति किसान परिवार 10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता करने, मछुआरों के परिवार को छह हजार रुपये की सहायता करने का वायदा किया है। पार्टी ने ओबीसी वर्ग में नये समुदायों को साथ लाने जैसा आरक्षण का दांव भी खेला है जो बंगाल में उसकी राह आसान कर सकते हैं।
पार्टी का मानना है कि इस रणनीति से आरक्षित 84 सीटों का एक बड़ा हिस्सा उसके साथ आ जाता है, तो मुस्लिम आबादी के कमजोर प्रतिनिधित्व वाली बाकी की सामान्य सीटों को साथ मिलाकर इस बार ममता की सत्ता को चुनौती दी जा सकती है। पार्टी इस समय इसी अभियान को आगे बढ़ाने में जुटी हुई है।