असम के विधानसभा चुनाव में भाजपा दोबारा सत्ता पर काबिज हो रही है। कांग्रेस गठबंधन अपने पुराने आंकड़े पर आकर ही सिमट रहा है। ऐसे में असम में न तो प्रियंका का चेहरा चला न भूपेश बघेल की कोई रणनीति। असम में प्रियंका के फेल होने के सवाल पर किदवई का कहना है कि असम के चुनाव में पार्टी ने एक प्रयोग किया था, जिसमें किसी राज्य के सीएम को चुनाव मैनजमेंट की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन पार्टी वहां कभी भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं थी। उनके गठबंधन सहयोगियों ने भी चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। कांग्रेस कद्दावर नेता तरुण गोगोई के देहांत के बाद पार्टी के पास राज्य में कोई चेहरा ही नहीं था, जो भाजपा के सर्बानंद सोनोवाल और हेमंत बिस्वा सरमा की काट बन सके।
इधर, केरल में वामदलों की अगुवाई वाले गठबंधन लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) एक बार फिर सत्ता में वापसी करती हुई दिख रही है। रुझान में एलडीएफ को 140 में 96 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं, कांग्रेस की अगुवाई वाली यूडीएफ के पास सिर्फ 44 सीटें जाती दिख रही है। केरल पर राजनीतिक विशलेषक किदवई का कहना है कि कोविड के दौरान केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के कामों को जनता ने सराहा हैं। लेकिन कांग्रेस वहां के भ्रष्टाचार और परिस्थितियों को ठीक से जनता के बीच उठा नहीं सकी। राहुल गांधी को केरल में अच्छा रिस्पांस मिला लेकिन वो इसे सीटों में नहीं बदल सकने में नाकाम रहे।
तमिलनाडु में डीएमके कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनती दिख रही है। डीएमके गठबंधन 152 सीटों पर आगे है, जबकि एआईएडीएमके और भाजपा गठबंधन 97 सीटों पर आगे है। डीएमके बहुमत के आंकड़े को पार कर गई है। किदवई ने आगे बताया कि, तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके ने अच्छा मिलकर चुनाव लड़ा। सीएम के दावेदर एमके स्टालिन कांग्रेस के लोगों का अपनी सरकार में ध्यान रखेंगे तो कांग्रेस के लिए ये थोड़ा सुखद होगा।