किसी वक्त जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर कूदकर सुर्खियों में आईं युवा ममता ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि वह एक दिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनेंगी। स्कूली दिनों से ही राजनीति में दिलचस्पी रखने वाली दीदी को 70 के दशक में पहली बार राज्य महिला कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। तब वे कॉलेज में ही पढ़ रहीं थीं।
गरीबी से संघर्ष करना उन्होंने बचपन में ही सीख लिया था। लगातार कई चुनाव जीतने और केंद्र में कई मंत्रालय संभालने के बाद मतभेद के चलते 1997 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाई। 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने पूर्वी मिदनापुर जिले के गांव नंदीग्राम में किसानों की जमीन का अधिगृहण किया था। 'स्पेशल इकनॉमिक जोन' नीति के तहत यहां एक केमिकल हब की स्थापना होनी थी।
विपक्षी पार्टियों ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और जमीन पर उतरकर विरोध दर्ज करवाया। फैसले के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ, जिसका ममता बनर्जी ने सामने से नेतृत्व किया। आंदोलन में कई ग्रामीणों की जान गईं। सैकड़ों लोग घायल हुए। चुनाव में यह सरकार के खिलाफ गया और नंदीग्राम आंदोलन के दम पर ही ममता बनर्जी ने लेफ्ट को उखाड़ फेंकने में सफलता पाई।
सिर्फ पोशाक और रहन-सहन को देखकर ही ममता बनर्जी को जमीन से जुड़ा नेता नहीं कहा जाता। आंदोलन उनकी राजनीति का सबसे बड़ा आभूषण है। नंदीग्राम के साथ-साथ सिंगूर आंदोलन ने भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका अदा की थी। तब यहां की 400 एकड़ जमीन पर टाटा कंपनी का नैनो कार प्लांट बनना था।
ममता ने यहां भी भूमि अधिग्रहण का पुरजोर विरोध किया। वह गरीब किसानों के साथ अंत तक लड़तीं रहीं। चुनाव में भारी बहुमत से चुने जाने के बाद ममता बनर्जी ने जब 2011 में सूबे की सत्ता संभाली तो उनकी सरकार का पहला फैसला सिंगूर के किसानों की जमीन लौटाना था। शहरी आबादी भले ही ममता से छिटकी हो, लेकिन बंगाल के गांवों में टीएमसी का बड़ा वोट बैंक निवास करता है।
इन दो आंदोलनों ने ममता बनर्जी की छवि किसान हितैषी नेता की बना दी, जिसे मौजूदा हालात में भी दीदी भुनाने में लगी हुई है। दिल्ली की सीमाओं पर कई माह से आंदोलन पर बैठे किसानों को समर्थन देने के बहाने दीदी केंद्र की बीजेपी सरकार पर बरसना नहीं भूलतीं।