फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

पश्चिम बंगाल: बदलेगी सियासत या पुरानी धुरी पर घूमेगा पहिया

हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली Published by: स्नेहा बलूनी Updated Sat, 27 Feb 2021 09:51 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
पीएम मोदी, अमित शाह और ममता बनर्जी (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

चुनाव आयोग ने जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की, उनमें सर्वाधिक अहम है पश्चिम बंगाल। सवाल बस एक ही है। राज्य की सियासत पुरानी धुरी पर ही घूमेगी या नई पटकथा लिखी जाएगी। पुरानी धुरी पर सियासत घूमने का अर्थ होगा, बीते सात दशक से सत्ता की चाभी उसी के पास होना जिसे अल्पसंख्यकों का एकमुश्त समर्थन मिले। नई सियासत का मतलब उत्तर प्रदेश और असम की तरह नए समानांतर ध्रुवीकरण होना होगा।

भाजपा-टीएमसी में सीधी टक्कर
पश्चिम बंगाल में मौजूदा समय में टीएमसी और भाजपा में टक्कर होगी। राज्य की सियासत में सत्ता का पर्याय माने जाने वाले वामदल अब अप्रासांगिक हो गए हैं। कांग्रेस अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब नहीं रही। अब यह दोनों मिल कर नई जमीन की तलाश में हैं।



अहम है मुस्लिम फैक्टर
राज्य में 28 फीसदी मतदाता मुसलमान हैं। संख्याबल के कारण मुस्लिम मतदाता ने बीते सात दशक में सत्ता का रास्ता तैयार किया है। आजादी के बाद जब तक यह बिरादरी कांग्रेस के साथ रही तब तक पार्टी ने सत्ता का सुख भोगा। इसके बाद इस बिरादरी ने वामदलों का साथ दे कर एक समय इन्हें अजेय बना दिया। मगर सिंगुर और नंदीग्राम की घटना से इस बिरादरी के मोहभंग ने वामदलों को कहीं का नहीं छोड़ा और सत्ता का ताज टीएमसी को पहना दिया। अब पहली बार राज्य में भाजपा इसी परंपरागत राजनीति के लिए चुनौती बन कर खड़ी हुई है।

भाजपा को समानांतर ध्रुवीकरण और आदिवासी वोटों का सहारा
बीते लोकसभा चुनाव में धमाकेदार प्रदर्शन से भाजपा उत्साहित है। महज पांच साल में पार्टी के सांसदों की संख्या में नौ गुना तो मतदाताओं की संख्या में चार गुना बढ़ोत्तरी हुई है। भाजपा की पहली रणनीति राज्य की परंपरागत मुस्लिम समर्थन की राजनीति के खिलाफ समानांतर ध्रुवीकरण करने और 11 फीसदी आदिवासी मतदाताओं को साधने की है। इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने के लिए पार्टी राज्य की ममता सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का लगातार आरोप लगा रही है। जल्द सीएए और एनआरसी को लागू करने की घोषणा इसी रणनीति का हिस्सा है। इसके अलावा सीएम ममता पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है। इस दौरान टीएमसी के एक दर्जन विधायकों और तीन मंत्रियों के पाला बदलने से भी पार्टी उत्साहित है।

पुराने समीकरण पर टिकी है टीएमसी
भाजपा के उलट टीएमसी पुराने समीकरण के सहारे ही सत्ता बचाने की कोशिशों में जुटी है। पार्टी मुस्लिम मतदाताओं को पहले की तरह साधे रखने और काडर वोट के सहारे मैदान मारना चाहती है। हालांकि, मुश्किल यह है कि इस बार मुस्लिम मतों में सेंध लगाने के लिए एमआईएमआईएम असदुद्दीन ओवैसी, इंडियन सेक्युलर फ्रंट के अब्बास सिद्दीकी और कांग्रेस-वामदल गठबंधन भी पूरी ताकत लगा रहे हैं।

विज्ञापन

पीएम मोदी, अमित शाह और ममता बनर्जी (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
चुनाव आयोग ने जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की, उनमें सर्वाधिक अहम है पश्चिम बंगाल। सवाल बस एक ही है। राज्य की सियासत पुरानी धुरी पर ही घूमेगी या नई पटकथा लिखी जाएगी। पुरानी धुरी पर सियासत घूमने का अर्थ होगा, बीते सात दशक से सत्ता की चाभी उसी के पास होना जिसे अल्पसंख्यकों का एकमुश्त समर्थन मिले। नई सियासत का मतलब उत्तर प्रदेश और असम की तरह नए समानांतर ध्रुवीकरण होना होगा।

भाजपा-टीएमसी में सीधी टक्कर
पश्चिम बंगाल में मौजूदा समय में टीएमसी और भाजपा में टक्कर होगी। राज्य की सियासत में सत्ता का पर्याय माने जाने वाले वामदल अब अप्रासांगिक हो गए हैं। कांग्रेस अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब नहीं रही। अब यह दोनों मिल कर नई जमीन की तलाश में हैं।

अहम है मुस्लिम फैक्टर
राज्य में 28 फीसदी मतदाता मुसलमान हैं। संख्याबल के कारण मुस्लिम मतदाता ने बीते सात दशक में सत्ता का रास्ता तैयार किया है। आजादी के बाद जब तक यह बिरादरी कांग्रेस के साथ रही तब तक पार्टी ने सत्ता का सुख भोगा। इसके बाद इस बिरादरी ने वामदलों का साथ दे कर एक समय इन्हें अजेय बना दिया। मगर सिंगुर और नंदीग्राम की घटना से इस बिरादरी के मोहभंग ने वामदलों को कहीं का नहीं छोड़ा और सत्ता का ताज टीएमसी को पहना दिया। अब पहली बार राज्य में भाजपा इसी परंपरागत राजनीति के लिए चुनौती बन कर खड़ी हुई है।

भाजपा को समानांतर ध्रुवीकरण और आदिवासी वोटों का सहारा
बीते लोकसभा चुनाव में धमाकेदार प्रदर्शन से भाजपा उत्साहित है। महज पांच साल में पार्टी के सांसदों की संख्या में नौ गुना तो मतदाताओं की संख्या में चार गुना बढ़ोत्तरी हुई है। भाजपा की पहली रणनीति राज्य की परंपरागत मुस्लिम समर्थन की राजनीति के खिलाफ समानांतर ध्रुवीकरण करने और 11 फीसदी आदिवासी मतदाताओं को साधने की है। इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने के लिए पार्टी राज्य की ममता सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का लगातार आरोप लगा रही है। जल्द सीएए और एनआरसी को लागू करने की घोषणा इसी रणनीति का हिस्सा है। इसके अलावा सीएम ममता पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है। इस दौरान टीएमसी के एक दर्जन विधायकों और तीन मंत्रियों के पाला बदलने से भी पार्टी उत्साहित है।

पुराने समीकरण पर टिकी है टीएमसी
भाजपा के उलट टीएमसी पुराने समीकरण के सहारे ही सत्ता बचाने की कोशिशों में जुटी है। पार्टी मुस्लिम मतदाताओं को पहले की तरह साधे रखने और काडर वोट के सहारे मैदान मारना चाहती है। हालांकि, मुश्किल यह है कि इस बार मुस्लिम मतों में सेंध लगाने के लिए एमआईएमआईएम असदुद्दीन ओवैसी, इंडियन सेक्युलर फ्रंट के अब्बास सिद्दीकी और कांग्रेस-वामदल गठबंधन भी पूरी ताकत लगा रहे हैं।

अहम हैं ये तथ्य

भले ही लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने प्रदर्शन से सबको चौंकाया हो, मगर हकीकत यह है कि टीएमसी के वोट शेयर में कोई बदलाव नहीं हुआ है। बीते विधानसभा में टीएमसी को 44.91 फीसदी वोट मिले थे, जबकि लोकसभा चुनाव में उसे 43.69 फीसदी मत मिले। लोकसभा चुनाव में भाजपा को थोक के भाव में उन मतदाताओं का भी साथ मिला जिन्हें कांग्रेस, वामदलों का वोट बैंक माना जाता था। इस दौरान वाम दलों के मत में 13 फीसदी तो कांग्रेस के मत में छह फीसदी की गिरावट आई, जबकि भाजपा को वोट दस फीसदी से बढ़ कर 40 फीसदी को पार कर गया। अब सवाल यह है कि क्या लोकसभा चुनाव में वाम-कांग्रेस समर्थक जो मतदाता भाजपा से जुड़े वह विधानसभा चुनाव में भी उसके साथ रहेंगे?

भाजपा की मजबूती
  • मोदी के रूप में दमदार चेहरा
  • शाह की अचूक रणनीति
  • टीएमसी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर
  • लोकसभा में दमदार प्रदर्शन से बदला वातावरण
  • बूथ स्तर पर जबर्दस्त तैयारी

भाजपा की कमजोरी
  • राज्य में ममता की कद को कोई दमदार चेहरा नहीं
  • लोकसभा चुनाव के मुकाबले विधानसभा चुनाव में वोट शेयर में गिरावट
  • कांग्रेस-वाम दलों का साथ आना
  • पार्टी में बाहरियों के प्रवेश पर मतभेद

टीएमसी की मजबूती
  • बीते दस सालों से वोट बैंक पर मजबूत पकड़
  • ममता के रूप में आक्रामक नेतृत्व वाला चेहरा
  • 28 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं में अब रही गहरी पैठ
  • भ्रष्टाचार मामले में व्यक्तिगत स्तर पर आरोप नहीं
  • बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का जाल

टीएमसी की कमजोरी
  • दस साल की सत्ता के कारण एंटी इंकम्बेंसी
  • पार्टी में भगदड़
  • भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ पार्टी में मतभेद
  • रोजगार-उद्योग मामले में औसत प्रदर्शन
  • बड़े चेहरों का लगातार पार्टी से किनारा

विधानसभा चुनाव 2016
 
पार्टी वोट प्रतिशत वौट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी सीट की कमी
टीएमसी 44.91 1.22 फीसदी 211
वाम दल 19.75 13 फीसदी 26
कांगेस 12.25 6 फीसदी 44
भाजपा 10.16 30 फीसदी बढ़ोत्तरी 03

लोकसभा चुनाव
पार्टी वोट प्रतिशत सीटे- नुकसान
टीएमसी 43.69 22-12 सीटों का नुकसान
भाजपा 40.64 2-16 सीटों का लाभ
कांग्रेस 5.67 2- 2 सीटों का नुकसान
वाम दल 6.34 0- 2 सीटों का नुकसान
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next