चुनाव आयोग ने जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की, उनमें सर्वाधिक अहम है पश्चिम बंगाल। सवाल बस एक ही है। राज्य की सियासत पुरानी धुरी पर ही घूमेगी या नई पटकथा लिखी जाएगी। पुरानी धुरी पर सियासत घूमने का अर्थ होगा, बीते सात दशक से सत्ता की चाभी उसी के पास होना जिसे अल्पसंख्यकों का एकमुश्त समर्थन मिले। नई सियासत का मतलब उत्तर प्रदेश और असम की तरह नए समानांतर ध्रुवीकरण होना होगा।
भाजपा-टीएमसी में सीधी टक्कर
पश्चिम बंगाल में मौजूदा समय में टीएमसी और भाजपा में टक्कर होगी। राज्य की सियासत में सत्ता का पर्याय माने जाने वाले वामदल अब अप्रासांगिक हो गए हैं। कांग्रेस अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब नहीं रही। अब यह दोनों मिल कर नई जमीन की तलाश में हैं।
अहम है मुस्लिम फैक्टर
राज्य में 28 फीसदी मतदाता मुसलमान हैं। संख्याबल के कारण मुस्लिम मतदाता ने बीते सात दशक में सत्ता का रास्ता तैयार किया है। आजादी के बाद जब तक यह बिरादरी कांग्रेस के साथ रही तब तक पार्टी ने सत्ता का सुख भोगा। इसके बाद इस बिरादरी ने वामदलों का साथ दे कर एक समय इन्हें अजेय बना दिया। मगर सिंगुर और नंदीग्राम की घटना से इस बिरादरी के मोहभंग ने वामदलों को कहीं का नहीं छोड़ा और सत्ता का ताज टीएमसी को पहना दिया। अब पहली बार राज्य में भाजपा इसी परंपरागत राजनीति के लिए चुनौती बन कर खड़ी हुई है।
भाजपा को समानांतर ध्रुवीकरण और आदिवासी वोटों का सहारा
बीते लोकसभा चुनाव में धमाकेदार प्रदर्शन से भाजपा उत्साहित है। महज पांच साल में पार्टी के सांसदों की संख्या में नौ गुना तो मतदाताओं की संख्या में चार गुना बढ़ोत्तरी हुई है। भाजपा की पहली रणनीति राज्य की परंपरागत मुस्लिम समर्थन की राजनीति के खिलाफ समानांतर ध्रुवीकरण करने और 11 फीसदी आदिवासी मतदाताओं को साधने की है। इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने के लिए पार्टी राज्य की ममता सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का लगातार आरोप लगा रही है। जल्द सीएए और एनआरसी को लागू करने की घोषणा इसी रणनीति का हिस्सा है। इसके अलावा सीएम ममता पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है। इस दौरान टीएमसी के एक दर्जन विधायकों और तीन मंत्रियों के पाला बदलने से भी पार्टी उत्साहित है।
पुराने समीकरण पर टिकी है टीएमसी
भाजपा के उलट टीएमसी पुराने समीकरण के सहारे ही सत्ता बचाने की कोशिशों में जुटी है। पार्टी मुस्लिम मतदाताओं को पहले की तरह साधे रखने और काडर वोट के सहारे मैदान मारना चाहती है। हालांकि, मुश्किल यह है कि इस बार मुस्लिम मतों में सेंध लगाने के लिए एमआईएमआईएम असदुद्दीन ओवैसी, इंडियन सेक्युलर फ्रंट के अब्बास सिद्दीकी और कांग्रेस-वामदल गठबंधन भी पूरी ताकत लगा रहे हैं।