कूच बिहार और उत्तर बंगाल के अन्य सीमावर्ती जिलों में रहने वाले राजबंशियों तथा पूर्ववर्ती पूर्वी पाकिस्तान से आए मतुआ शरणार्थियों एवं उनके वंशजों का दक्षिण बंगाल में 30-40 सीटों पर प्रभाव है। वे पश्चिम बंगाल में दो सबसे बड़े दलित समुदाय हैं, जिन्हें लुभाने के लिए तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों लगे हुए हैं। दोनों दल दलितों और अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) के अधिकारों की बात कर रहे हैं। राज्य में 68 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए तथा 16 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।
भाजपा और टीएमसी ने किया ये बड़ा वादा
टीएमसी और भाजपा दोनों ने ही सत्ता में आने पर महिष्य, तेली, तामुल और साहा जैसे समुदायों को मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुसार ओबीसी की सूची में शामिल करने का वादा किया है।
हर जुगत भिड़ा रहीं पार्टियां
तृणमूल कांग्रेस ने जहां इस चुनाव में 79 दलित प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतुआ संप्रदाय के आध्यात्मिक गुरु हरिचंद ठाकुर के जन्मस्थान बांग्लादेश के ओराकांडी में एक प्रसिद्ध मंदिर का दौरा किया था। तृणमूल कांग्रेस के एक उम्मीदवार द्वारा कथित तौर पर दलितों की तुलना भिखारियों से करने का मुद्दा भी चुनाव में चर्चा का विषय बना हुआ है।
बता दें कि भारतीय जनता पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की अधिकतर सुरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने अपनी नीति में बदलाव किया और सभी शरणार्थी कॉलोनियों को नियमित करके उन्हें भूमि अधिकार दिए। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) के क्रियान्वयन में देरी तथा संशय की स्थिति को भी भुनाने का प्रयास किया। प्रदेश भाजपा प्रमुख दिलीप घोष ने कहा कि भाजपा ने पिछड़ा वर्गों की आकांक्षाओं के बारे में बात करके उन्हें आवाज दी है। दलित इस चुनाव में निर्णायक कारक होंगे और हमारे पक्ष में मतदान करेंगे।