अकाल में पैदो ले चार ही वंश
सासी, कुत्ता, गिद्ध और सरपंच।
बुंदेलखंड में कही जाने वाली ये लोकोक्ति कभी सूखे की त्रासदी को बयां करने के लिए कही गई होंगी। उस सूखे के लिए जिसके कारण आधे से ज्यादा भारत की आबादी पिछले तीन सालों से जूझ रही है। इस साल भी मानसून आने से पहले ही आधे भारत में सूखे के हालात बन रहे हैं।
महाराष्ट्र के लातूर में पानी को बचाने के लिए धारा 144 लागू कर दी गई है तो मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में एक नहर के पानी की रखवाली के लिए दस से ज्यादा बंदूकधारी 24 घंटे तैनात रहते हैं।
मध्यप्रदेश के ही छतरपुर में लोग शाम होते ही घर छोड़ देते हैं और कई कई किलोमीटर का सफर करने के बाद एक पहाड़ से बहने वाले झरने से बूंद बूंद पानी इकट्ठा कर सुबह घर लौटते हैं। हमेशा पानी से लबालब रहने वाला नासिक का पवित्र रामकुंड 130 सालों में पहली बार पूरी तरह सूख गया है।
पानी को लेकर यह मारामारी मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में ही नहीं है उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड और पूर्वी इलाका, उड़ीसा, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलाडु, राजस्थान और गुजरात के तटवर्ती इलाकों में भी आसार अच्छे नजर नहीं आते।
उत्तर प्रदेश का गंगा यमुना का दोआब क्षेत्र जहां दस साल पहले तक 30-40 फुट गहराई पर ही पर्याप्त पानी मिल जाता था वहां अब 100 फुट से ज्यादा खुदाई करने पर भी पानी नजर नहीं आता।
मौसम विज्ञानी इसका कारण इन इलाकों में बढ़ते सूखे के प्रभाव को मानते हैं। जिसकी वजह से जमीन के नीचे मौजूद जल तो तेजी से सूख ही रहा है पर्याप्त वर्षा न होने के कारण धरती भी लगातार बंजर होती जा रही है।