चुनाव आयोग की लीप ऑफ फेथ नामक किताब में जिक्र है कि जनप्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक, 1958 में फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र का प्रावधान किया गया था। 1960 में इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया, जो सफल नहीं हुआ। तमाम मुश्किलों और भारी खर्च के कारण परियोजना दोबारा शुरू करने में तीन दशक से ज्यादा समय लग गया। अंतत: 1993 में राष्ट्रीय स्तर पर फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र पेश किए गए।
बड़े भाई सीईसी, छोटे केंद्रीय मंत्री... और बन गई बात
फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र की संकल्पना और उसे धरातल पर उतारने में दो भाइयों का बड़ा योगदान रहा। 27 नवंबर, 1958 को तत्कालीन कानून मंत्री अशोक कुमार सेन ने जब जनप्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक लोकसभा में रखा, तब मुख्य चुनाव आयुक्त उनके बड़े भाई सुकुमार सेन थे। 30 दिसंबर, 1958 को विधेयक संसद से पारित होकर कानून बना। हालांकि, सुकुमार सेन तब तक सेवानिवृत्त हो गए थे और 10 दिन पहले ही पद संभालने वाले दूसरे मुख्य चुनाव आयुक्त केवीके सुंदरम पर इसे देशभर में लागू कराने की जिम्मेदारी आ गई।
कोलकाता में असफल कोशिश, सिक्किम में सफल
1957 के लोकसभा चुनाव के बाद निर्वाचन आयोग ने रिपोर्ट दी कि अगर 1962 के आम चुनाव में शहरी क्षेत्रों में फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र जारी किए जाएं, तो धांधली रोकने में मदद मिलेगी। इसके मद्देनजर कलकत्ता (अब कोलकाता) के दक्षिण-पश्चिम लोकसभा क्षेत्र में 1960 में हुए उपचुनाव में यह प्रयोग किया गया, मगर हर आठ में से तीन मतदाता पहचान पत्र से वंचित रह गए। 1979 में सिक्किम में हुए विधानसभा चुनाव में फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र जारी किए गए। प्रयोग सफल रहा।