गैंगस्टर विकास दुबे (फाइल फोटो)
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कानपुर के कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे और उसके साथियों की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की अदालत की निगरानी में जांच की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सोमवार को उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) एसए बोबडे ने हैदराबाद मुठभेड़ और विकास दुबे मुठभेड़ में अंतर बताया। उन्होंने कहा कि ये केवल एक मुठभेड़ का मामला नहीं है बल्कि ये पूरी प्रणाली पर सवालिया निशान है।
सीजेआई बोबडे ने कहा कि हैदराबाद मुठभेड़ में मारे गए आरोपी और विकास दुबे मुठभेड़ में एक बड़ा अंतर है। वे एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के आरोपी थे। उनके पास हथियार नहीं थे। वहीं विकास दुबे पुलिस वालों के सहयोगी पुलिसकर्मियों का हत्यारा था। यूपी डीजीपी तरफ से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि यह मामला तेलंगाना मुठभेड़ से कई मायनों में अलग है।
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उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बहस की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि ये मुठभेड़ सही थी। इसका विवरण बताते हुए मेहता ने कहा कि दुबे पैरोल पर था। उसने हिरासत से भागने की कोशिश की। इसपर सीजेआई ने कहा कि विकास दुबे के खिलाफ मुकदमे के बारे में बताएं। आपने अपने जवाब में कहा है कि तेलंगाना में हुई मुठभेड़ और इसमें अंतर है। लेकिन आप कानून के शासन को लेकर सतर्क होंगे। आपने सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच भी शुरू की है।
यूपी के डीजीपी की तरफ से अदालत में पेश हुए साल्वे ने कहा कि यह मामला तेलंगाना मुठभेड़ से काफी अलग है। यहां तक कि पुलिसकर्मियों के भी मौलिक अधिकार हैं। क्या तब पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया जा सकता है जब वह एक खूंखार अपराधी के साथ लाइव मुठभेड़ कर रही हो? बता दें कि विकास दुबे ने बेरहमी से आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी।