राजस्थान में कांग्रेस का प्रदर्शन, मध्यप्रदेश के मुकाबले भले बेहतर रहा हो लेकिन जिस प्रदेश में बीती एक-चौथाई सदी से एक-एक बार राज का चलन रहा हो वहां इसे इतनी दमदार कोशिश भी नहीं कहा जा सकता। भाजपा को जहां 38.8 फीसदी वोट मिले हैं तो कांग्रेस को 39.3 फीसदी यानी दोनों के बीच ठीक आधा फीसदी वोटों का अंतर।
जीत- कितनी पास, कितनी दूर
राजस्थान हो या मध्यप्रदेश, दोनों राज्यों में कांग्रेस बहुमत के आंकड़े को छूने के करीब आकर भी दूर हो गई। जीत के शोर में हो सकता है इसे लेकर अभी बहुत चर्चा न हो, लेकिन बड़े नेताओं को भीतर ही भीतर ये बात साल जरूर रही होगी।
दूसरी दिक्कत लोकसभा चुनावों को लेकर है। 6 महीने से कम में 2019 की जंग लड़ी जानी है। मध्यप्रदेश में 15 साल सरकार चलाने के बावजूद जिस तरह का वोट प्रतिशत शिवराज के पाले में आया है, उससे प्रदेश की 29 सीटों पर कांग्रेस को खासी मुश्किल लड़ाई लड़नी होगी। उधर, राजस्थान में 2014 में 25 की 25 सीट पर कब्जा जमाने वाली भाजपा के सामने कांग्रेस ने इन चुनावों में कोई ऐसा अद्भुत प्रदर्शन नहीं किया है कि लोकसभा चुनाव में उसकी राह बहुत आसान हो। फिलहाल, वो विजेता है और उसके पास मौका है, इन दोनों प्रदेशों में अपनी जड़ें मजबूत करने का।
इसलिए हम कह रहे हैं, भाजपा हार कर भी नहीं हारी और कांग्रेस क्यों जीत कर भी नहीं जीती।